सत्य निकेतन हादसा: कागजी ऑडिट, प्रशासनिक लापरवाही और छात्र जीवन पर मंडराता मौत का साया

punjabkesari.in Tuesday, Sep 08, 2026 - 01:42 PM (IST)

नई दिल्ली: दक्षिणी दिल्ली के सत्य निकेतन में ‘हॉस्टल डेज’ नामक पीजी इमारत का ढहना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि दिल्ली की भवन सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल है। छात्र अपने परिवारों से दूर पढ़ाई और बेहतर भविष्य के सपने लेकर दिल्ली आते हैं। लेकिन अगर उन्हें रहने के लिए ऐसी इमारत मिलती है, जिसकी सुरक्षा पर ही सवाल हों, तो यह सिर्फ मकान मालिक की नहीं, पूरी व्यवस्था की विफलता है। इस हादसे में अब तक सात लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और कई लोग घायल हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस इमारत में छात्र रह रहे थे, उसे हादसे से पहले सुरक्षित क्यों नहीं किया गया?

MCD की भूमिका पर गंभीर सवाल
MCD के अनुसार यह इमारत लगभग 55 वर्ग गज के प्लॉट पर बनी थी और मूल अनुमति ग्राउंड प्लस एक मंजिल की थी, जबकि मौके पर इससे कहीं अधिक मंजिलों का ढांचा मौजूद था। रिपोर्टों के अनुसार इमारत के पास sanctioned building plan और Fire NOC भी नहीं था। सवाल यह है कि नियमों का इतना बड़ा उल्लंघन था, तो संबंधित अधिकारियों की नजर इस पर पहले क्यों नहीं पड़ी? अवैध निर्माण और भवन सुरक्षा की निगरानी हादसे के बाद नहीं, उससे पहले होनी चाहिए।

निर्माण और मरम्मत के दौरान निगरानी कहां थी?
हादसे के समय इमारत में मरम्मत और निर्माण से जुड़ा काम चल रहा था। बेसमेंट में काम और पानी जमा होने जैसी बातें भी सामने आई हैं, जिनकी जांच की जा रही है।
लेकिन सवाल यह है कि इतनी पुरानी इमारत में संरचनात्मक बदलाव हो रहे थे तो क्या संबंधित विभागों ने इसकी जांच की? क्या यह देखा गया कि निर्माण कार्य से इमारत की सुरक्षा प्रभावित तो नहीं हो रही?

सिर्फ ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ की घोषणा काफी नहीं
दिल्ली में किसी बड़े हादसे के बाद सबसे पहले ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ और जांच की घोषणा होती है। लेकिन असली जरूरत यह है कि ऑडिट हादसे के बाद नहीं, नियमित रूप से पहले हो। सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर और दूसरे छात्र बहुल इलाकों में बड़ी संख्या में छात्र पीजी और किराये के मकानों में रहते हैं। यहां भवन सुरक्षा, फायर सेफ्टी और वैध निर्माण की नियमित जांच अनिवार्य होनी चाहिए। कागज पर बना कोई प्रमाणपत्र किसी परिवार के बच्चे की जान की गारंटी नहीं हो सकता। जमीन पर वास्तविक निरीक्षण ही सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।

पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही भी तय हो
जांच केवल मकान मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका भी जांच के दायरे में होनी चाहिए। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि किसी अधिकारी की मिलीभगत या भ्रष्टाचार था। लेकिन अगर जांच में किसी अधिकारी की जानबूझकर लापरवाही, नियमों की अनदेखी या किसी तरह की सांठगांठ सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

अब सवाल कार्रवाई का है
सिर्फ FIR, निलंबन और कुछ दिनों की सुर्खियां इस हादसे का जवाब नहीं हैं। जरूरी है कि जांच समयबद्ध तरीके से पूरी हो और जिसकी भी वास्तविक जिम्मेदारी सामने आए, उसके खिलाफ कार्रवाई हो। सत्य निकेतन में जान गंवाने वाले लोग सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। वे किसी के बेटे, किसी की बेटी और किसी परिवार की उम्मीद थे। अब दिल्ली को तय करना होगा कि क्या हर हादसे के बाद सिर्फ जांच और ऑडिट की घोषणा होगी, या ऐसी व्यवस्था बनेगी जो हादसा होने से पहले खतरे को पहचानकर उसे रोक सके।
क्योंकि किसी भी शहर की असली तरक्की उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा से होती है।


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Content Writer

Ramkesh

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