Indian Currency Fell: रुपये में ऐतिहासिक गिरावट, डॉलर के मुकाबले इतनी हो गई भारतीय करेंसी
punjabkesari.in Friday, Mar 27, 2026 - 10:02 AM (IST)
Doller/Rupee: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर साफ दिखने लगा है। भारत की मुद्रा भी इस दबाव से अछूती नहीं रही। शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और 94 का आंकड़ा पार कर गया।
दिन के दौरान रुपया 94.1575 प्रति डॉलर तक गिर गया, जो इससे पहले बने 93.98 के रिकॉर्ड से भी नीचे है। यह गिरावट उस ट्रेंड को दिखाती है जो पिछले कुछ हफ्तों से लगातार बना हुआ है। जब से मिडिल ईस्ट में संघर्ष शुरू हुआ है, तब से रुपया करीब 3.5% कमजोर हो चुका है।
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह ऊर्जा संकट की बढ़ती चिंता है। युद्ध के कारण तेल सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति और मुश्किल पैदा करती है।
जब तेल महंगा होता है तो उसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता जाता है। फिलहाल कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है, जो बाजार के लिए चिंता का बड़ा कारण है।
इसका असर सिर्फ मुद्रा तक सीमित नहीं है। दुनियाभर के शेयर बाजारों में दबाव देखने को मिला है और बॉन्ड यील्ड भी ऊपर जा रही है। निवेशक महंगाई और आर्थिक सुस्ती को लेकर सतर्क हो गए हैं। भारत के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है क्योंकि यहां ऊर्जा आयात का बोझ पहले से ही बड़ा है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी सीधे अर्थव्यवस्था पर असर डालती है।
विशेषज्ञों ने अब भारत की आर्थिक वृद्धि के अनुमान में भी कटौती शुरू कर दी है। साथ ही यह संभावना भी जताई जा रही है कि आने वाले समय में रिजर्व बैंक को महंगाई काबू में रखने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। तेल की ऊंची कीमतें महंगाई को बढ़ा सकती हैं, जिससे आम लोगों की जेब पर भी असर पड़ेगा। भले ही युद्ध जल्दी खत्म हो जाए, लेकिन इसके असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में रुपया और कमजोर हो सकता है और यह 98 प्रति डॉलर तक भी पहुंच सकता है। इसकी मुख्य वजह भारत का बढ़ता चालू खाता घाटा हो सकता है, जो महंगे तेल के कारण और बढ़ सकता है। फिलहाल नजरें वैश्विक हालात पर टिकी हैं। तेल की कीमतें और मिडिल ईस्ट का तनाव आगे रुपया की दिशा तय करेंगे।
