धारा-497 क्या है , आइए जानें

Thursday, Sep 27, 2018 - 03:59 PM (IST)

Section 497 In Hindi :  सुप्रीम कोर्ट ने आज एडल्टरी को अपराध के दायरे से बाहर रखते हुए 158 साल पुरानी एडल्ट्री कानून धारा-497 (IPC Section 497) को खत्म कर दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि अब समय आ गया यह कहने का कि पति पत्नी का मालिक नहीं है। महिलाओं की अपनी गरिमा और सम्मान है जो सबसे ऊपर है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ में जस्टिस आर.एफ. नरीमन, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस इंदू मल्होत्रा और जस्टिस ए.एम. खानविलकर ने यह फैसला सुनाया।

आईपीसी की धारा 497 है क्या 

  • आईपीसी की धारा-497 के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष का किसी अन्य शादीशुदा महिला के साथ उसकी रजामंदी से शारीरिक संबंध होता है तो उक्त महिला का पति उस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज करवा सकता है। हालांकि पति अपनी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता।
  • वहीं जिस पुरुष के संबंध दूसरी महिला से थे उसकी पत्नी भी उक्त महिला के खिलाफ मामला या शिकायत दर्ज नहीं करवा सकती जबकि वह अपने पति पर कार्रवाई करवा सकती है।
  • इतना ही नहीं उनके रिश्तेदार भी पुरुष और महिला के खिलाफ शिकायत नहीं करा सकते।


 

यह है पूरा मामला

केरल के एक अनिवासी भारतीय जोसेफ साइन ने आईपीसी की धारा-497 की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जोसेफ की याचिका को कोर्ट ने दिसंबर, 2017 को सुनवाई के लिए स्वीकार किया था और इसी साल जनवरी में केस को संविधान की पीठ के पास भेजा गया था। जिस पर कोर्ट ने आज अपना फैसला सुनाया है।

 

धारा-497 पर सरकार का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र से भी राय पूछी थी जिस पर सरकार ने तर्क देते हुए कहा था कि व्यभिचार विवाह संस्थान के लिए खतरा है। केंद्र ने कहा था कि इससे परिवारों पर असर पड़ेगा। केंद्र की तरफ से कोर्ट में पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पिंकी आंनद ने कहा था कि हमारे देश और समाज में बदलाव हो रहे हैं, लोगों का नजरिया भी बदल रहा है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि पश्चिमी देशों के नजरिए से इस पर फैसला दिया जाए और कानून बनाया जाए।


कोर्ट की खास टिप्पणियां

  • सीजेआई मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने कहा, ‘‘हम विवाह के खिलाफ अपराध से संबंधित आईपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 को असंवैधानिक घोषित करते हैं।
  • जस्टिस नरीमन ने धारा 497 को पुरातनपंथी कानून बताते हुए फैसले पर अपनी सहमति जताई।
  • धारा 497 समानता का अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करती है।
  • व्यभिचार के मामले में किसी व्यक्ति को पांच साल के लिए जेल भेजने का औचित्य नहीं है।
  • चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में व्यभिचार अपराध नहीं है।
  • महिलाओं के साथ असमान व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं है।

Seema Sharma

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