GB कार्यकर्ता सेंगे सेरिंग बोलेः‘ चीन का दलाल पाकिस्तान छोड़े गिलगित-बाल्टिस्तान; भारत में विलय की मांग

punjabkesari.in Monday, Oct 05, 2026 - 04:34 PM (IST)

Peshawar:  पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक दावा सामने आया है। गिलगित-बाल्टिस्तान के राजनीतिक कार्यकर्ता और वाशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज के संस्थापक सेंगे सेरिंग ने कहा है कि पाकिस्तान को इस क्षेत्र से हटना चाहिए। उनके मुताबिक गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान की पकड़ के पीछे रणनीतिक स्थिति, पानी और चीन से सीधा जमीनी संपर्क जैसे बड़े कारण हैं। रणनीतिक मामलों पर आधारित एक साक्षात्कार में सेरिंग ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा बताया और कहा कि इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का नियंत्रण वहां की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा है। हालांकि, ये उनके राजनीतिक विचार और दावे हैं।

 

सेरिंग के मुताबिक गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उसे चीन तक जमीनी रास्ता देता है। इसके अलावा इस इलाके में सिंधु नदी तंत्र के ऊपरी हिस्से स्थित हैं। उनका दावा है कि इन्हीं रणनीतिक और प्राकृतिक संसाधनों के कारण पाकिस्तान इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है।उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बदले गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान के अन्य प्रांतों के समान संवैधानिक और राजनीतिक अधिकार नहीं दिए गए हैं। सेरिंग ने इस क्षेत्र को पाकिस्तान के नियंत्रण वाला इलाका और उपनिवेश तक बताया। सेरिंग ने दावा किया कि स्थानीय लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही है और अधिक अधिकार तथा आत्मनिर्णय की मांग तेज हुई है। उनके मुताबिक कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता अब पाकिस्तान की मौजूदगी को खुलकर चुनौती दे रहे हैं और स्वतंत्रता की मांग भी कर रहे हैं।

 

हालांकि, सेरिंग ने यह भी कहा कि स्वतंत्र गिलगित-बाल्टिस्तान को वह जरूरी नहीं कि सबसे व्यावहारिक विकल्प मानते हों। उनका तर्क है कि बेहद रणनीतिक स्थिति के कारण स्वतंत्र देश बनने पर यह क्षेत्र चीन, भारत, पाकिस्तान, अमेरिका, खाड़ी देशों और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसी स्थिति में गिलगित-बाल्टिस्तान लगातार बाहरी शक्तियों के टकराव का मैदान बन सकता है। सेरिंग ने इसके बजाय गिलगित-बाल्टिस्तान को भारत के संवैधानिक ढांचे में वापस लाने की वकालत की। उनका कहना है कि इस व्यवस्था में क्षेत्र को अपनी भाषा, संस्कृति और राजनीतिक पहचान बनाए रखने की पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए।

 

उनके अनुसार भारत इस क्षेत्र को आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक स्थिरता का मजबूत ढांचा उपलब्ध करा सकता है, जबकि स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को भी संरक्षित रखा जा सकता है। गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति की तुलना करते हुए सेरिंग ने बलूचिस्तान का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि दोनों क्षेत्रों में राजनीतिक उपेक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर असंतोष रहा है। उन्होंने पाकिस्तान के इतिहास में पूर्वी पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग जातीय और भाषाई पहचान वाले क्षेत्रों को राजनीतिक रूप से साथ रखने में पाकिस्तान को लंबे समय से चुनौती रही है।  सेरिंग ने कश्मीर विवाद को पाकिस्तान की सेना के राजनीतिक और आर्थिक हितों से भी जोड़ा।  उन्होंने पाकिस्तान में भविष्य में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता बने रहने की बात कही और कहा कि इसका सबसे ज्यादा असर बलूचिस्तान, गिलगित-बाल्टिस्तान तथा पश्तून बहुल इलाकों पर पड़ सकता है।

 


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Content Writer

Tanuja

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