मौत के बाद भी अमर हो गई जिंदगी! दिल्ली के डॉक्टरों ने कर दिखाया करिश्मा, एक शरीर में फिट की दो किडनी
punjabkesari.in Thursday, Mar 12, 2026 - 09:33 AM (IST)
First En-bloc Dual Kidney Transplant : भारत में किडनी ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) के डॉक्टरों ने एक वयस्क मरीज में एन-ब्लॉक ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट (En-bloc Dual Kidney Transplant) को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। डोनर की कमी से जूझ रहे देश में यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं मानी जा रही है।
क्या है यह एन-ब्लॉक तकनीक?
आमतौर पर जब एक डोनर अंगदान करता है तो उसकी दो किडनी दो अलग-अलग मरीजों को दी जाती हैं लेकिन कई बार मृत डोनर की किडनी का आकार छोटा होता है या वह एक किडनी अकेले पूरे शरीर का भार उठाने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं होती (खासकर यदि डोनर को डायबिटीज रही हो)। ऐसी स्थिति में डॉक्टर एक ही मरीज के शरीर में दोनों किडनी को एक साथ प्रत्यारोपित कर देते हैं। इसे ही 'एन-ब्लॉक ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट' कहते हैं। इससे किडनी की कार्यक्षमता (Efficiency) बढ़ जाती है और मरीज को लंबे समय तक डायलिसिस से मुक्ति मिल जाती है।
भारत में पहला ऐसा मामला
ILBS के रीनल ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. अभियुत्थन सिंह जादौन के मुताबिक भारत में किसी वयस्क (Adult) मरीज में इस तरह का ट्रांसप्लांट यह पहला मामला है। इससे पहले यह तकनीक सिर्फ बच्चों के लिए इस्तेमाल की जाती थी। पूरी दुनिया में भी खासकर अमेरिका में ऐसे बेहद कम मामले दर्ज हैं।
आंकड़े जो डराते हैं: दिल्ली में हालात गंभीर
वर्ल्ड किडनी डे पर सामने आई रिपोर्ट बताती है कि भारत में किडनी ट्रांसप्लांट की मांग और आपूर्ति के बीच जमीन-आसमान का अंतर है:
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राष्ट्रीय स्थिति: हर साल 1 लाख लोगों को किडनी की जरूरत होती है, पर मिल पाती है सिर्फ 35 हजार को।
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दिल्ली की चुनौती: राजधानी में हालात और भी खराब हैं। यहाँ 100 मरीजों में से केवल 2 मरीजों को ही मृत डोनर (Cadaveric Donor) की किडनी मिल पाती है।
जागरूकता ही है असली समाधान
विशेषज्ञों का कहना है कि जीवित डोनर (Living Donor) की प्रक्रिया में कई कानूनी और सामाजिक पेच होते हैं। ऐसे में मृत अंगदान (Cadaveric Donation) ही एकमात्र रास्ता है जिससे बड़ी संख्या में मरीजों की जान बचाई जा सकती है। दिल्ली के एम्स (AIIMS) और आईएलबीएस जैसे संस्थान अब इस दिशा में नई तकनीकों के जरिए मरीजों को नई जिंदगी दे रहे हैं।
