मोहन भागवत बोले - लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन मकसद आम सहमति होना चाहिए
punjabkesari.in Thursday, Aug 06, 2026 - 10:08 PM (IST)
नेशनल डेस्क : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन संवाद का एक वैध तरीका है, लेकिन इसका मकसद विभाजन पैदा करने के बजाय आम सहमति बनाना होना चाहिए। भागवत ने मुंबई में 'इंडियाज़ इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशन्स' (आईआईएमयूएन) के 15वें वर्षगांठ कार्यक्रम में में 'जेन-जी' और 'जेन अल्फा' के लगभग 2,000 सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा, ''विरोध प्रदर्शन भी बातचीत का एक तरीका है। लोकतंत्र में, विरोध प्रदर्शन आम सहमति बनाने का एक जरिया है। अलग-अलग विचार एक साथ आते हैं और चर्चा के बाद आम सहमति बनती है।''
उन्होंने कहा, ''अगर विभिन्न कारणों से बातचीत के जरिए चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो लोग आंदोलन की ओर जा सकते हैं। लेकिन इन सबका मकसद आम सहमति बनाना है, न कि विभाजन पैदा करना। जेन-जी की शिकायतें जायज़ हैं और मुझे उनकी ईमानदारी पर भरोसा है।'' भागवत के इस संवाद को आरएसएस की ओर से 'जेन-जी' और 'जेन अल्फा' तक पहुंचने की सबसे अहम कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। यह कोशिश 'कॉकरोच जनता पार्टी' (कॉजपा) के उस विरोध-प्रदर्शन के बाद हो रही है, जो नीट प्रश्नपत्र लीक को लेकर हुआ था तथा उसके फलस्वरूप केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। भागवत ने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली को लेकर जताई जा रही चिंताएं जायज हैं। उन्होंने कहा कि संवाद हमेशा पहला कदम होना चाहिए। भागवत ने कहा, ''बातचीत होनी चाहिए। अगर बातचीत से काम न बने तो आगे क्या किया जाए, इस पर बाद में विचार किया जा सकता है।''
सरसंघचालक ने कहा कि जेन-जी अपनापन और सम्मान के साथ-साथ 'तार्किक जवाब' भी चाहता है, जबकि पिछली पीढ़ियां बिना सवाल किए बड़ों की बात मान लेती थीं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाना इसके नुकसानदेह असर का समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज को आत्म-अनुशासन विकसित करना चाहिए और ऑनलाइन किसी भी बात पर विश्वास करने से पहले विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए।
भागवत ने कहा कि जब तक लोगों का नज़रिया नहीं बदलेगा, तब तक सिर्फ़ नियम-कानून काम नहीं आएंगे। उन्होंने कहा, ''नियम और अनुशासन जरूरी हैं, लेकिन वे तभी सफल होते हैं जब सोच बदलती है। कई कानून बनाए गए हैं। असल में जो बात मायने रखती है वह है लोगों की सोच में बदलाव।'' प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग के बारे में चेतावनी देते हुए सरसंघचालक ने कहा कि लोगों को बिना जांच-पड़ताल के सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा, ''आज प्रौद्योगिकी हमारे चेहरे और आवाज का इस्तेमाल करके नकली वीडियो बना सकती है। यह पता होने पर लोगों को कभी भी सोशल मीडिया पर किसी भी चीज़ पर तब तक विश्वास नहीं करना चाहिए जब तक कि वे विश्वसनीय स्रोतों से उसकी पुष्टि न कर लें।''
भागवत ने यह भी कहा कि 'सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स' की अपने 'फॉलोवर्स' के प्रति ज़िम्मेदारी होती है। उन्होंने कहा, ''अगर मैं सोशल मीडिया पर कोई मशहूर हस्ती हूं और 10 लाख लोग मुझे फ़ॉलो करते हैं, तो यह मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं यह पक्का करूं कि मुझे फ़ॉलो करने की वजह से वे किसी मुसीबत में न पड़ें। इतनी समझदारी जरूरी है।'' उन्होंने स्व-नियमन का आह्वान करते हुए कहा कि पुरानी पीढ़ी को युवाओं की मदद करनी चाहिए ताकि वे सोशल मीडिया का ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करने की समझ विकसित कर सकें। भागवत ने कहा, ''सोशल मीडिया के इस्तेमाल में हमें खुद से अनुशासन बनाए रखने की ज़रूरत है। एक बार जब यह अनुशासन आ जाएगा, तो नियम प्रभावी ढंग से काम करेंगे।''
इस सवाल पर कि क्या भारत को बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पाबंदी लगा देनी चाहिए, जैसा कि कुछ अन्य देशों ने किया है, भागवत ने कहा कि पाबंदी इसका समाधान नहीं है। उन्होंने कहा, ''अगर आप किसी चीज़ पर पाबंदी लगाते हैं, तो वह बस ब्लैक मार्केट में चली जाती है तथा और भी ज़्यादा फैल जाती है। पूरे समाज को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा। तभी सरकार की कोशिशें सफल होंगी।'' भागवत ने यह भी कहा कि वह शिक्षा पर खर्च को जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के छह प्रतिशत तक बढ़ाने की मांग का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, ''शिक्षा कोई वाणिज्यिक कारोबार नहीं है। इसे इस तरह से व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि यह सभी को सुलभ हो।'' सरसंघचालक ने कहा कि शिक्षा की स्थिति को बेहतर बनाने में समाज को भी योगदान देना चाहिए। भागवत ने कहा कि रोज़गार का मतलब सिर्फ़ नौकरी ही नहीं, बल्कि उद्यमिता भी है।
