औद्योगिक विकास के दौर में श्रमिकों की सुरक्षा घटाना चिंताजनक: जयराम रमेश

punjabkesari.in Saturday, Aug 22, 2026 - 02:01 PM (IST)

नई दिल्ली: कांग्रेस ने शनिवार को कहा कि उच्चतम न्यायालय के 'उद्योग' की परिभाषा से जुड़ा हालिया फैसला चिंताजनक है क्योंकि इससे ऐसे समय श्रम संबंधों में अनिश्चितता पैदा हुई है, जब निजी क्षेत्र द्वारा सेवाएं उपलब्ध कराने की भूमिका लगातार बढ़ रही है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार की औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 श्रमिकों के लिए जरूरी सुरक्षा प्रावधानों को पहले ही काफी कमजोर करती है। उच्चतम न्यायालय ने बीते 20 अगस्त को 6:3 के बहुमत से कहा था कि 1978 के अपने फैसले में दी गई श्रम हितैषी और व्यापक 'उद्योग' की परिभाषा को औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत के फैसले में यह भी कहा था कि 'उद्योग' की परिभाषा से संबंधित 1978 के सात सदस्यीय पीठ के फैसले पर पुनर्विचार के लिए भेजा गया संदर्भ वैध था।

ये भी पढ़ें- चीनी प्रबंधन और इथेनॉल-ब्लेंडिंग नीतियों खरगे ने सरकार पर साधा निशाना, पूछे बड़े सवाल

रमेश ने उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को लेकर 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, ''अगस्त 2026 का बहुमत का यह फैसला चिंताजनक है, क्योंकि यह ऐसे समय में श्रम संबंधों में अनिश्चितता पैदा करता है, जब औद्योगिक शांति के लिए स्पष्टता बेहद जरूरी है।'' उन्होंने कहा कि खुली अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र द्वारा सेवाएं उपलब्ध कराने की भूमिका लगातार बढ़ रही है और '''इंडस्ट्री' की व्यापक परिभाषा को संकीर्ण करने या कानून को उससे दूर ले जाने वाला कोई भी कदम श्रमिकों की सुरक्षा को ठीक उसी समय कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है, जब इसकी सबसे अधिक जरूरत है।'' उन्होंने कहा कि इस फैसले में फरवरी 1978 के ऐतिहासिक बैंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा मामले में निर्धारित 'त्रिस्तरीय कसौटी' को नए सिरे से परिभाषित करने की एक ''हाइपोथीसिस'' पेश की गई है।

PunjabKesari

रमेश के मुताबिक, "1978 के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने किसी गतिविधि को 'उद्योग' मानने के लिए तीन प्रमुख तत्व निर्धारित किए थे, ये हैं- व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग तथा मानवीय जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने वाली वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण। " उन्होंने कहा कि इस कसौटी के तहत लाभ कमाने का उद्देश्य जरूरी नहीं माना गया था और धर्मार्थ संस्थाओं तथा सार्वजनिक निकायों की गतिविधियां भी इसके दायरे में आ सकती थीं। उनका कहना कि करीब पांच दशकों तक इस कसौटी ने समय-समय पर संशोधित औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत यह तय करने के लिए व्यापक और स्थापित ढांचा उपलब्ध कराया कि किसे 'उद्योग' माना जाए और इसके कारण बड़ी संख्या में श्रमिकों को श्रम कानूनों का संरक्षण मिला।

ये भी पढ़ें- दिल्लीवालों आज जरा संभल कर निकलें घर से बाहर, IMD ने जारी किया भारी बारिश और आंधी- तूफान का अलर्ट

कांग्रेस महासचिव ने दावा किया कि 2026 का बहुमत का फैसला इस दृष्टिकोण को दो महत्वपूर्ण तरीकों से सीमित करता है। उनके अनुसार, अब किसी गतिविधि में व्यापार या व्यवसाय जैसा ''स्पष्ट व्यावसायिक चरित्र'' होने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, जो पहले की कसौटी में नहीं था। रमेश ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह पुनर्परिभाषा पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत पूरी हो चुकी या लंबित कार्यवाहियों को प्रभावित नहीं करेगी और न ही यह नई औद्योगिक संबंध संहिता की व्याख्या निर्धारित करेगी, लेकिन फैसले में इस ''परिकल्पना'' को छोड़ दिए जाने से व्याख्या को लेकर खालीपन पैदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इससे मुकदमों और अनिश्चितताओं का ''भानुमती का पिटारा'' खुल सकता है, खासकर श्रम अदालतों और औद्योगिक अधिकरणों के सामने। उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक संबंध संहिता केंद्र सरकार को प्रतिष्ठानों की और अधिक श्रेणियों को इसके दायरे से बाहर करने की शक्ति देती है, इसलिए व्यवहार में अधिक संकीर्ण परिभाषा स्थापित होने की गुंजाइश बनी हुई है। रमेश ने न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की असहमति का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने बैंगलोर जल आपूर्ति मामले में निर्धारित त्रिस्तरीय कसौटी पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं मानी और न्यायिक निश्चितता के हित में स्थापित कानून को अस्थिर करने के प्रति आगाह किया।


सबसे ज्यादा पढ़े गए

News Editor

Radhika

Related News