नेपाल की तबाही का सबसे दर्दनाक मंजर; कीचड़ में फंसी लाशें खोजते बेहाल परिवार, मुर्दाघरों में जगह की कमी कारण सड़ने लगे शव (Video)

punjabkesari.in Monday, Aug 31, 2026 - 11:42 AM (IST)

Kathmandu: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन का पानी भले कई इलाकों से उतरने लगा हो, लेकिन उसके पीछे छूटे मंजर ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। हर तरफ कीचड़, मलबा और तबाह हुए घरों के बीच अब लोग अपने लापता परिजनों की तलाश कर रहे हैं। कहीं परिवार मिट्टी और मलबे को हाथों से हटाकर अपनों को खोज रहे हैं, तो कहीं नदी के किनारों पर पहुंचकर शवों की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं। इस आपदा का सबसे दर्दनाक दृश्य नेपाल के चितवन जिले में देखने को मिला, जहां बाढ़ प्रभावित इलाकों से बहकर बड़ी संख्या में शव पहुंच रहे हैं। अधिकारियों के सामने अब सिर्फ लोगों को बचाने की चुनौती नहीं है, बल्कि इतनी बड़ी संख्या में शवों को संभालना भी मुश्किल हो गया है।

 

कीचड़ में अपनों को तलाशते परिवार
बाढ़ और भूस्खलन ने कई परिवारों को पल भर में बिखेर दिया। जिन लोगों के अपने लापता हैं, वे अब हर मिलने वाले शव को उम्मीद और डर के साथ देख रहे हैं।कई लोग नदी किनारे, कीचड़ में दबे इलाकों और मलबे के ढेरों के बीच अपने रिश्तेदारों की तलाश कर रहे हैं। किसी को उम्मीद है कि उसका अपना जिंदा मिल जाएगा, तो किसी को इस बात का डर सता रहा है कि कहीं अगला बरामद शव उसी के परिवार का सदस्य न हो। नेपाल की यह त्रासदी अब केवल मौतों के आंकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर उस परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी बन गई है, जो अपनों का कोई सुराग मिलने का इंतजार कर रहा है।

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मुश्किल में प्रशासन
चितवन जिले में करीब 250 शव पहचान के इंतजार में बताए गए। इनमें से कई शव बाढ़ के तेज बहाव के साथ दूर-दराज के इलाकों से बहकर पहुंचे थे। कई शव कई दिनों तक पानी में डूबे रहे। जब उन्हें बरामद किया गया, तब तक उनकी हालत खराब हो चुकी थी और सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।भीषण गर्मी और नमी ने हालात को और मुश्किल बना दिया। अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इतनी बड़ी संख्या में शवों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।

 

मुर्दाघरों में जगह नहीं
जिले में फॉरेंसिक सुविधाएं सीमित थीं और मुर्दाघरों में भी पर्याप्त जगह नहीं थी। बड़ी संख्या में शव आने के कारण प्रशासन पर भारी दबाव पड़ गया। अधिक नमी और गर्म मौसम के कारण शव तेजी से खराब होने लगे। स्वास्थ्य संबंधी जोखिम को देखते हुए अधिकारियों को जल्द फैसला लेना पड़ा। इसी मजबूरी में लगभग सौ अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से दफनाया गया। शवों को वाहनों के जरिए एक जंगल वाले इलाके में ले जाया गया, जहां मशीनों की मदद से गहरी खाइयां खोदी गईं।


 
अंतिम संस्कार पर विवाद
शवों को अस्थायी रूप से दफनाए जाने के बाद स्थानीय लोगों और लापता लोगों के परिवारों में नाराजगी भी सामने आई। नेपाल हिंदू बहुल देश है, जहां परंपरागत रूप से मृतकों का अंतिम संस्कार दाह संस्कार के जरिए किया जाता है। ऐसे में कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या शवों को इतनी जल्दी दफनाना जरूरी था। परिवारों का कहना है कि उन्हें अपने परिजनों की पहचान करने और धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम विदाई देने का मौका मिलना चाहिए। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने भी इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि मुर्दाघरों में जगह की कमी थी, तो अस्थायी मुर्दाघर या कोल्ड स्टोरेज जैसी व्यवस्था की जा सकती थी।

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 DNA नमूने बने परिवारों की आखिरी उम्मीद
हालांकि, प्रशासन का कहना है कि शवों को दफनाने से पहले उनकी पहचान की पूरी प्रक्रिया दर्ज की गई है। हर शव से DNA नमूने लिए गए हैं, तस्वीरें ली गई हैं और पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सुरक्षित रखी गई हैं। हर शव को एक अलग संदर्भ नंबर दिया गया है, ताकि भविष्य में कोई परिवार DNA या अन्य रिकॉर्ड के आधार पर अपने लापता रिश्तेदार की पहचान कर सके।अधिकारियों के अनुसार, ये कब्रें स्थायी व्यवस्था नहीं हैं। यदि बाद में किसी शव की पहचान हो जाती है, तो परिवार उसे वापस लेकर अपने धर्म और परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार कर सकता है।नेपाल की इस भीषण त्रासदी में अब DNA जांच उन परिवारों के लिए आखिरी उम्मीद बन गई है, जो कीचड़, मलबे और शवों के बीच आज भी अपने किसी अपने का इंतजार कर रहे हैं।
 


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Content Writer

Tanuja

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