Ice-Rock Avalanche: वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा: भारी बारिश नहीं, इसे बताया नेपाल में बाढ़ का असली कारण

punjabkesari.in Monday, Aug 31, 2026 - 12:05 PM (IST)

काठमांडू: नेपाल में भोटेकोशी-त्रिशूली गलियारे में तबाही मचाने वाली बाढ़ ऊंचे हिमालय में बड़े पैमाने पर बर्फीली चट्टानों के हिमस्खलन के कारण आई थी, न कि सामान्य बारिश की वजह से। नेपाली वैज्ञानिकों की प्रारंभिक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष सामने आया है। नेपाल एनवॉयरमेंट सोसाइटी (NES) की यह रिपोर्ट रविवार को जारी की गई। अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि नेपाल में अचानक आई बाढ़ में मरने वालों की संख्या बढ़कर 903 हो गई है और शवों की बरामदगी जारी है।

'माई रिपब्लिका' की खबर के अनुसार, अध्ययन में पाया गया कि रसुवा के लांगटांग-लिरुंग क्षेत्र में करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ, चट्टानों और मलबे का एक विशाल हिस्सा ल्हेंदे नदी में जा गिरा। इसके बाद पानी का तेज बहाव भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी में पहुंचा, जिससे भीषण बाढ़ आ गई। इस आपदा ने 26 अगस्त को उत्तरी और मध्य नेपाल के शहरों तथा गांवों में भारी तबाही मचाई थी।

अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि यह आपदा 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) यानी हिमनद झील के अचानक फटने से आई बाढ़ के कारण नहीं आई थी। अनुसंधानकर्ताओं ने उपग्रह तस्वीरों, जल विज्ञान एवं मौसम संबंधी आंकड़ों, भू-भाग की विशेषताओं तथा नदी तंत्र के साथ ऊंचाई और ढलान में हुए बदलावों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में कहा गया कि जीएलओएफ के कोई साक्ष्य नहीं मिले। 

अध्ययन के अनुसार, लांगटांग-लिरुंग के उत्तरी हिस्से से बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा गिरना शुरू हुआ। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से यह खड़ी ढलान से नीचे आया और करीब 2,930 मीटर की ऊंचाई पर ल्हेंदे नदी में पहुंचा। उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों में करीब 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़े भौगोलिक बदलाव दिखाई दिए, जबकि लगभग 0.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर अलग हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्धारित करने के लिए आगे मैदानी जांच जरूरी है कि सटीक भूगर्भीय प्रक्रिया, पिघलती बर्फ के योगदान और क्या नदी का बहाव ऊपरी हिस्से में कुछ समय के लिए बाधित हुआ था। 

अध्ययन में पाया गया कि बर्फ-चट्टान का यह विशाल मलबा महज सात मिनट से कुछ अधिक समय में करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय कर रसुवागढ़ी पहुंच गया। इसकी अनुमानित औसत गति 46.3 मीटर प्रति सेकंड यानी 167 किलोमीटर प्रति घंटे थी। रसुवागढ़ी से बेत्रावती के बीच इसकी गति घटकर करीब 73 किलोमीटर प्रति घंटा और आगे नीचे की ओर करीब 22 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई। रिपोर्ट में कहा गया कि गति कम होने के बावजूद प्रवाह अपने साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, तलछट और मिट्टी बहाता रहा। अध्ययन में यह भी पाया गया कि बाढ़ आने से कई घंटे पहले रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी क्षेत्रों में नदी का जलस्तर और बहाव कम हो गया था। रसुवागढ़ी में सुबह 5 बजे से 8 बजे के बीच औसत जलस्तर में गिरावट आई, जबकि स्याफ्रुबेसी में नदी का बहाव करीब सात बजे कम होना शुरू हो गया था।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि उस दिन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में असाधारण रूप से भारी बारिश के कोई साक्ष्य नहीं मिले। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि आपदा केवल अत्यधिक बारिश या बादल फटने के कारण हुई थी। इस आपदा से पनबिजली ढांचे को भी व्यापक नुकसान हुआ। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के प्रारंभिक आंकड़ों का हवाला देते हुए अध्ययन में कहा गया कि 13 पनबिजली परियोजनाएं और एक सौर परियोजना प्रभावित हुईं, जिससे करीब 431 मेगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता प्रणाली से बाहर हो गई। सरकार के प्रारंभिक आकलन का हवाला देते हुए अध्ययन में आर्थिक नुकसान करीब तीन लाख करोड़ नेपाली रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों में हुए नुकसान का विस्तृत आकलन अभी किया जा रहा है। 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Anu Malhotra