'देरी से दर्ज हुई FIR को नहीं बनाया जा सकता ढाल', यौन उत्पीड़न मामलों पर हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, छेड़छाड़ के आरोपी को नहीं मिली राहत
punjabkesari.in Saturday, Jun 13, 2026 - 01:10 PM (IST)
मुंबई : महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को आधार बनाकर जांच या मुकदमे को खत्म नहीं किया जा सकता। बंबई हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारतीय समाज में आज भी कई परिवार यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं को सार्वजनिक करने में संकोच करते हैं, इसलिए केवल शिकायत दर्ज होने में समय लगने को मामले को खारिज करने का आधार नहीं माना जा सकता।
काम के सिलसिले में घर गई महिला का यौन उत्पीड़न
हाई कोर्ट की एकल पीठ ने केरल के रहने वाले 58 वर्षीय व्यक्ति की वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने अपने खिलाफ दर्ज छेड़छाड़ के मुकदमे को रद्द करने की मांग की थी। मामला वर्ष 2019 का है और इसमें आरोपी की घरेलू सहायिका ने उसके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए थे। मामले के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया था कि वह काम के सिलसिले में आरोपी के घर गई थी, जहां उसके साथ अनुचित व्यवहार किया गया। किसी तरह वह वहां से निकलने में सफल रही और बाद में पूरी घटना अपने पति को बताई। इसके बाद परिवार ने अन्य लोगों को भी इसकी जानकारी दी और कुछ समय बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर मामला दर्ज हुआ।
सीसीटीवी फुटेज का हवाला देकर बेगुनाही साबित करने की कोशिश
हाई कोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि शिकायत दर्ज कराने में काफी समय लगा, इसलिए आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायतकर्ता और उसके पति ने कथित तौर पर पैसों के विवाद के चलते झूठा मामला दर्ज कराया है। आरोपी ने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए दावा किया कि घटना के बाद महिला सामान्य तरीके से इमारत से बाहर जाती दिखाई दे रही है।
'समाज के डर से चुप रहती हैं महिलाएं'
हालांकि अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से मामले की जांच और सुनवाई जारी रखने के पर्याप्त आधार दिखाई देते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं से जुड़े अपराधों में शिकायत दर्ज कराने में देरी असामान्य नहीं है, क्योंकि सामाजिक दबाव, परिवार की प्रतिष्ठा और मानसिक आघात जैसे कई कारण पीड़ित पक्ष को तत्काल कानूनी कदम उठाने से रोक सकते हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि देरी के पीछे दुर्भावना, निजी प्रतिशोध या किसी को फंसाने की मंशा पहली नजर में स्पष्ट रूप से साबित न हो, तो केवल इसी आधार पर आपराधिक कार्रवाई को समाप्त नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को महिलाओं से जुड़े अपराधों के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण माना जा रहा है, जिसमें शिकायत दर्ज होने में हुई देरी को स्वतः संदेह का कारण नहीं माना गया है।
