श्रीनगर में 8वें राष्ट्रीय सम्मेलन में जमीनी अनुभव और वास्तविकताएं बने भारत के सहकारी क्षेत्र के भविष्य के विजन और रोडमैप पर विचार-विमर्श का प्रमुख आधार

punjabkesari.in Thursday, Jun 25, 2026 - 06:04 PM (IST)

नेशनल डेस्क : श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में आज उद्घाटित ‘सहकार से समृद्धि- विजन से जमीनी वास्तविकता तक’ विषय पर आयोजित 8वें राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के सहकारी क्षेत्र के भविष्य के विजन और रोडमैप पर विचार-विमर्श का प्रमुख आधार जमीनी अनुभव और वास्तविकताएं रहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में, सम्मेलन का फोकस पिछले पांच वर्षों की परिवर्तनकारी पहलों को जमीनी स्तर पर मापनीय परिणामों में बदलने पर रहा।

राष्ट्रीय समीक्षा सम्मेलन में राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारी, सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार, राष्ट्रीय महासंघ, सहकारी संस्थाएं और सहकारी इकोसिस्टम के प्रमुख हितधारक शामिल हुए। विचार-विमर्श का उद्देश्य प्रगति की समीक्षा करना, जमीनी स्तर की चुनौतियों की पहचान करना, सफल मॉडल साझा करना और सहकारी विकास के अगले चरण के लिए अधिक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना रहा।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी ने कहा कि एक अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन भारत के सहकारी आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक क्षण रहा है। उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने बड़े पैमाने पर नियामक ढांचे से आगे बढ़कर विकासोन्मुखी और डिलीवरी-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं को ग्रामीण समृद्धि, समावेशी विकास और अंतिम छोर तक सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी वाली संस्थाओं के रूप में मजबूत करना है।

डॉ. भूटानी ने कहा कि पिछले पांच वर्षों के दौरान मंत्रालय ने सहकारी क्षेत्र की बुनियाद को मजबूत करने के लिए कार्य किया है, विशेष रूप से प्राथमिक कृषि ऋण समितियों के स्तर पर। उन्होंने PACS के कंप्यूटरीकरण, मॉडल बायलॉज को अपनाने, नए बहुउद्देशीय PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों के गठन, PACS के व्यवसाय विविधीकरण और निर्यात, जैविक उत्पादों तथा बीजों के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाओं के गठन जैसी प्रमुख पहलों को रेखांकित किया।

सहकारिता मंत्रालय के सचिव ने कहा कि अब समय आ गया है कि संख्या से आगे बढ़कर सहकारी संस्थाओं में गुणवत्ता, जवाबदेही, पेशेवर प्रबंधन और जमीनी स्तर पर दिखने वाले प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया जाए। उन्होंने कहा कि नीति ढांचे और संस्थागत सहयोग तंत्र तैयार करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन अगला चरण कार्यान्वयन, मापनीय परिणामों और जमीनी स्तर पर प्रभावी डिलीवरी पर केंद्रित होना चाहिए।

प्रौद्योगिकी अपनाने, डेटा-आधारित गवर्नेंस और भविष्य के लिए तैयार सहकारी संस्थाओं पर विशेष जोर देते हुए डॉ. भूटानी ने कहा कि यूपीआई और डिजिटल वित्तीय सेवाओं के युग में सहकारी बैंकों को प्रासंगिक और प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए आधुनिक तकनीकी प्लेटफॉर्म अपनाने होंगे। उन्होंने जोर दिया कि ग्रामीण और शहरी सहकारी बैंकों को साझा तकनीकी समाधान, मजबूत गवर्नेंस प्रणाली, बेहतर सेवा डिलीवरी और अधिक वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता है।

डॉ. भूटानी ने सहकारी क्षेत्र में स्थिरता और सर्कुलैरिटी पहलों की आवश्यकता पर भी जोर दिया, विशेष रूप से डेयरी, कम्प्रेस्ड बायोगैस और चीनी उद्योग के उप-उत्पादों जैसे क्षेत्रों में। उन्होंने कहा कि सहकारी संस्थाएं ग्रामीण अपशिष्ट को मूल्य में बदलने, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ाने और सदस्यों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

डॉ. भूटानी ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से इन संस्थाओं के गठन में तेजी लाने का आग्रह किया और कहा कि PACS सहकारी ढांचे की रीढ़ हैं। उन्होंने जोर दिया कि प्रौद्योगिकी, मॉडल बायलॉज, व्यवसाय विविधीकरण और बेहतर गवर्नेंस के माध्यम से इन्हें मजबूत करना ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन को साकार करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

डेटा-आधारित गवर्नेंस के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. भूटानी ने कहा कि राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस 2.0 सहकारी क्षेत्र में योजना निर्माण, निगरानी और निर्णय लेने की प्रक्रिया को और मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि उन्नत प्लेटफॉर्म सहकारी संस्थाओं को सीधे डेटा अपडेट और वैलिडेट करने में सक्षम बनाएगा, जिससे नीति समर्थन, कार्यान्वयन और निगरानी के लिए उपलब्ध जानकारी की गुणवत्ता में सुधार होगा।

सहकारी क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी अन्न भंडारण योजना का उल्लेख करते हुए डॉ. भूटानी ने राज्यों से इस योजना के तहत अवसंरचना निर्माण को मजबूत करने और फसल कटाई के बाद होने वाली क्षति को कम करने की दिशा में काम करने को कहा। उन्होंने कहा कि इस पहल में भंडारण सुविधाओं को किसानों के नजदीक लाकर और कृषि मूल्य श्रृंखलाओं में सहकारी संस्थाओं की भूमिका को मजबूत करके जमीनी स्तर पर कृषि अवसंरचना को बदलने की क्षमता है।

सम्मेलन की एक प्रमुख विशेषता इसका राज्य-नेतृत्व वाला स्वरूप रहा। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने विचार-विमर्श का नेतृत्व किया और श्रेष्ठ कार्यप्रणालियां, सफल मॉडल, नवाचार और जमीनी चुनौतियां साझा कीं। इस दृष्टिकोण ने व्यावहारिक अनुभवों के आदान-प्रदान को सक्षम बनाया और तेज कार्यान्वयन के लिए कार्रवाई योग्य क्षेत्रों की पहचान करने में मदद की।

सम्मेलन के दौरान उत्तर-पूर्वी राज्यों में सहकारी विकास और समावेशी विकास के मार्गों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के राज्यों ने सहकारी इकोसिस्टम को मजबूत करने में अपने अनुभव, प्रगति, अवसर और विशिष्ट चुनौतियां साझा कीं। चर्चाओं में उत्तर-पूर्व में सहकारी संस्थाओं के लिए क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण, बेहतर संस्थागत सहयोग और अधिक मजबूत बाजार संपर्कों की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

सम्मेलन के दौरान भारत के सहकारी इकोसिस्टम को मजबूत करने में राष्ट्रीय संस्थाओं/संघों की भूमिका पर भी विचार-विमर्श किया गया। NABARD, NDDB, IFFCO, KRIBHCO, NAFED, NCCF और NCDC जैसी संस्थाओं ने सहकारी संस्थाओं के माध्यम से वित्तपोषण, क्षमता निर्माण, बाजार समर्थन, संस्थागत विकास और क्षेत्रीय परिवर्तन पर अपने दृष्टिकोण साझा किए।

राज्य-नेतृत्व वाली चर्चाएं अपूर्ण पंचायतों में नए बहुउद्देशीय PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों के गठन के माध्यम से भारत के सहकारी आधार के विस्तार पर केंद्रित रहीं। सम्मेलन में कृषि अवसंरचना निर्माण में सहकारी संस्थाओं की भूमिका पर भी केंद्रित विचार-विमर्श हुआ। चर्चा का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय व्यवसाय विविधीकरण के माध्यम से PACS को सशक्त बनाना रहा। राज्यों ने PACS द्वारा कई व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने के लिए विकसित मॉडल, सफल PACS के केस स्टडी और विविधीकरण के नए अवसर साझा किए। विचार-विमर्श में यह रेखांकित किया गया कि विविधीकृत, पेशेवर रूप से प्रबंधित और प्रौद्योगिकी-सक्षम PACS ग्रामीण क्षेत्रों में जीवंत आर्थिक संस्थाओं के रूप में उभर सकते हैं।

सम्मेलन में NCEL, NCOL और BBSSL जैसी नई पीढ़ी की राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं के माध्यम से राष्ट्रीय मूल्य श्रृंखलाओं के निर्माण पर भविष्य-केंद्रित सोच पर बल दिया गया। सम्मेलन ने निर्यात, जैविक उत्पादों और बीजों में सहकारी-नेतृत्व वाले मॉडलों को मजबूत करने तथा उत्पादकों, संस्थाओं, बाजारों और उपभोक्ताओं के बीच संपर्कों को बेहतर बनाने पर जोर दिया।

डिजिटल परिवर्तन, डेटा-आधारित निर्णय-निर्माण और AI सहित उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग भी सम्मेलन के महत्वपूर्ण फोकस क्षेत्र रहे। सम्मेलन ने सहकारी संस्थाओं को कंप्यूटरीकरण से आगे बढ़ाकर ऐसी बुद्धिमान, पारदर्शी और उत्तरदायी प्रणालियों की ओर ले जाने पर जोर दिया, जो बेहतर गवर्नेंस, सेवा डिलीवरी और योजना निर्माण में सहयोग कर सकें।

सम्मेलन के दौरान राष्ट्रीय महासंघों से विभिन्न योजनाओं के लिए राज्य-विशिष्ट योजनाएं तैयार करने और उनके कार्यान्वयन की नियमित निगरानी करने को कहा गया। जोर इस बात पर रहा कि राष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं और महासंघ राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर कार्यान्वयन को सहयोग दें, क्षेत्रीय स्तर की चुनौतियों का समाधान करें और विभिन्न क्षेत्रों में परिणामों को बेहतर बनाएं।

सम्मेलन में राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में तेज़ी से क्रियान्वयन और आगामी छह महीनों के लक्ष्यों के लिए कार्यान्वयन योग्य बिंदु तय किए गए। सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श से ‘सहकार से समृद्धि’ के विज़न को साकार करने में मदद मिलेगी और देशभर में सहकारी आंदोलन को और अधिक मजबूती मिलेगी।


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News Editor

Parveen Kumar

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