राजनीतिक ध्रुवीकरण पारदर्शिता को कमजोर कर रहा, भारत वैश्विक निवेशकों के लिए 'रहस्य' : अभिजीत बनर्जी

punjabkesari.in Saturday, Jan 31, 2026 - 01:05 PM (IST)

नेशनल डेस्क : नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि भारत में बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण पारदर्शिता को कमजोर कर रहा है और देश को वैश्विक निवेशकों के लिए एक ''रहस्य'' बना रहा है, भले ही आर्थिक वृद्धि के आंकड़े मजबूत बने हुए हों। बनर्जी ने एक न्यूज एजेंसी को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि आर्थिक दृष्टि से आज देश के सामने सबसे अहम मुद्दे मीडिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता हैं।

उन्होंने कहा कि निवेशकों के लिए राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा आंकड़ों की विश्वसनीयता मायने रखती है। उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि भारत राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत दौर से गुजर रहा है। कई टकराव लंबे समय से जारी हैं और हमें एक राष्ट्र के रूप में तय करना होगा कि हम खुद को कितना खुला और भरोसेमंद दिखाना चाहते हैं। असली मुद्दे मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़े हैं।'' बनर्जी ने कहा, ''सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही हैं- मीडिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता। क्या हमें सच में पता है कि आंकड़े क्या कह रहे हैं? निवेशक यही देखते हैं।''

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हालांकि, भारत में विदेशी निवेश आता रहा है, लेकिन उन्होंने इसे अस्थिर और अत्यधिक अनिश्चित बताया। उन्होंने कहा, ''हमने विदेशी निवेश के मोर्चे पर ठीक-ठाक प्रदर्शन किया है, लेकिन यह अस्थिर है। रुपया इसलिए कमजोर हो रहा है क्योंकि पैसा पर्याप्त तेज़ी से नहीं आ रहा।'' बनर्जी ने आगाह किया कि नीतिगत अनिश्चितता और आंतरिक ध्रुवीकरण दीर्घकालिक निवेश गंतव्य के रूप में भारत की साख को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा, ''लोगों को पता होना चाहिए कि नीति के नियम क्या हैं। क्या किसी खास कंपनी के प्रति रवैये में अचानक बदलाव होगा?''

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बनर्जी ने कहा, ''जब तक हमारे पास एक बेहद पूर्वानुमेय और पारदर्शी नीतिगत ढांचा और स्वतंत्र मीडिया नहीं होगा, भारत दुनिया के लिए एक रहस्य बना रहेगा।'' उन्होंने कहा कि अगर भारत अपने पूंजी बाजारों को मजबूत करना और दीर्घकालिक वैश्विक पूंजी आकर्षित करना चाहता है, तो पारदर्शिता को संस्थागत स्तर पर अपनाना होगा, न कि कभी-कभार। अर्थशास्त्री ने कहा, ''अगर हम ऐसा देश बनना चाहते हैं जहां लोग हमेशा निवेश करना चाहें, तो हर स्तर पर पारदर्शिता जरूरी है।'' उन्होंने पूछा, ''सबको उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा कैसे मिलेगी? अच्छे रोज़गारों की कमी के इस जाल से कैसे बाहर निकलेंगे? और अगर एआई इन नौकरियों को भी छीन लेता है तो क्या होगा?'' बनर्जी (64) ने चेतावनी दी कि केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि की सुर्खियां लंबे समय तक गहरे सामाजिक संकट को नहीं छिपा सकती।

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उन्होंने कहा, ''जीडीपी बढ़ सकती है, लेकिन अगर ज़्यादातर लोगों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी, तो विकास धीमा पड़ेगा और समस्या बढ़ेगी। वितरण से जुड़े सवालों का समाधान अब भी ज़रूरी है।'' बाजारों के अलावा उन्होंने राजनीतिक स्थिरता के लिए दीर्घकालिक जोखिमों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि जब संस्थानों पर भरोसा टूटता है, तो आर्थिक सुधार लगभग असंभव हो जाते हैं। अर्थशास्त्री ने कहा, ''अगर लोगों को लगे कि वे मतदान प्रक्रिया से बाहर किए जा रहे हैं, तो इससे और समस्याएं पैदा होती हैं।'' उन्होंने कहा कि भरोसे में कमी सहमति-आधारित सुधारों को बेहद कठिन बना देती है। अभिजीत बनर्जी कोलकाता में 'एक्साइड कोलकाता लिटरेरी मीट' में अर्थशास्त्र से जुड़े विषय पर चर्चा के लिए पहुंचे थे। 

 

 


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Mehak

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