पिघलते ग्लेशियर और टूटते पहाड़, जानिए बार-बार कुदरत का कहर क्यों झेल रहा है हिमाचल?
punjabkesari.in Tuesday, Jul 01, 2025 - 01:19 PM (IST)

नेशनल डेस्क: एक समय था जब हिमाचल प्रदेश अपनी हरी-भरी वादियों, शांत पहाड़ों और बर्फीली चोटियों के लिए मशहूर था। लेकिन अब वही वादियां बार-बार कुदरती आपदाओं की चपेट में आ रही हैं। कभी भूस्खलन होता है, तो कभी बादल फटते हैं, कभी बाढ़ आती है, तो कभी फ्लैश फ्लड। इन घटनाओं से न सिर्फ जान-माल का भारी नुकसान हो रहा है, बल्कि हिमाचल की अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी गहरा असर पड़ा है। आखिर हिमाचल के हालात इतने बिगड़ क्यों गए हैं? इस रिपोर्ट में हम जानेंगे कि कैसे जलवायु परिवर्तन, भौगोलिक कमजोरियां और मानवीय गलतियां मिलकर हिमाचल को तबाही की ओर धकेल रही हैं और क्या किए जा सकते हैं इन आपदाओं को कम करने के लिए।
1. जलवायु परिवर्तन: तापमान में बढ़ोत्तरी और बिगड़ा मौसम
हिमाचल में औसतन 1.6 डिग्री सेल्सियस तापमान बीते 100 सालों में बढ़ा है। इससे बारिश का पैटर्न पूरी तरह बदल गया है। अब बारिश पहले की तरह धीरे-धीरे नहीं बल्कि एकदम तेज और कम समय में होती है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। बादल फटना अब हिमाचल प्रदेश में एक आम घटना बनता जा रहा है। यह तब होता है जब बहुत कम समय में किसी छोटे से इलाके में अत्यधिक बारिश हो जाती है, जिससे भारी तबाही होती है। 2024 में हिमाचल में ऐसे 18 बादल फटने की घटनाएं दर्ज की गईं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण वातावरण में नमी की मात्रा बढ़ गई है, जिससे इस तरह की घटनाओं की आवृत्ति में तेजी आई है। इसके अलावा, राज्य में बारिश का पैटर्न भी बदल गया है। 2023 में कुल्लू जिले में सामान्य से 180% ज्यादा बारिश हुई, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ा और पहाड़ों की ढलान कमजोर हो गई। नतीजतन, भूस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ती गईं। इसके साथ ही, मानसून के समय अगर पश्चिमी विक्षोभ भी सक्रिय हो जाए तो बारिश और अधिक तीव्र हो जाती है। जुलाई 2023 में ऐसा ही एक विक्षोभ शिमला, मंडी और कुल्लू में भारी तबाही का कारण बना, जब मानसूनी बारिश और पश्चिमी विक्षोभ ने मिलकर बेहद खतरनाक हालात पैदा कर दिए।
2. हिमालय की भौगोलिक अस्थिरता: युवा पहाड़, कमजोर नींव
हिमाचल प्रदेश हिमालय के उस हिस्से में है जो भूवैज्ञानिक रूप से अभी भी सक्रिय और अस्थिर है। यह क्षेत्र भूकंप के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। हिमाचल प्रदेश भूकंपीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। कांगड़ा, मंडी, हमीरपुर, चंबा और कुल्लू जैसे जिले भूकंप के लिहाज से जोन IV और V में आते हैं, जहां तीव्र भूकंप आने की संभावना अधिक रहती है। भूकंप के साथ जब लगातार बारिश होती है, तो चट्टानें और मिट्टी की परतें कमजोर हो जाती हैं, जिससे भूस्खलन और स्लाइडिंग की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इसके अलावा, हिमाचल की लगभग 58% भूमि तेज मिट्टी कटाव के खतरे में है। राज्य के पहाड़ों की ऊंचाई और ढलानों की तीव्रता के कारण बारिश का पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है और अपने साथ मिट्टी को भी बहाकर ले जाता है, जिससे पहाड़ों की स्थिरता प्रभावित होती है। इस स्थिति का सीधा असर भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं के रूप में सामने आता है, जो न सिर्फ जन-धन की हानि का कारण बनती हैं बल्कि इलाके की पारिस्थितिकी को भी नुकसान पहुंचाती हैं।
3. ग्लेशियरों का पिघलना: बाढ़ की एक और वजह
जलवायु परिवर्तन का असर यहां की बर्फ और ग्लेशियरों पर भी साफ नजर आता है। जलवायु परिवर्तन का असर हिमाचल की बर्फीली चोटियों और ग्लेशियरों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ जाता है, जिससे बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इन बर्फीले क्षेत्रों में जब ठंडी और गर्म हवाएं आपस में टकराती हैं, तो वहां बादल फटने की घटनाएं अधिक होती हैं। ऐसे इलाकों में मौसम का यह असामान्य व्यवहार बेहद खतरनाक साबित होता है क्योंकि इससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है और पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी असंतुलित हो जाती है।
4. मानवीय हस्तक्षेप: हमने खुद भी बनाई आपदा की जमीन
हिमाचल प्रदेश में तेजी से हो रहा विकास कई बार प्रकृति पर भारी पड़ रहा है। राज्य में 174 जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हो रही हैं, जो मिलकर 11,000 मेगावाट से अधिक बिजली पैदा करती हैं। इन परियोजनाओं के निर्माण के लिए नदियों का प्रवाह रोका जाता है और पहाड़ों को बड़े पैमाने पर काटा जाता है, जिससे उनकी प्राकृतिक मजबूती कमजोर पड़ जाती है। 2023 में सैंज, मलाना और पार्वती प्रोजेक्ट्स के आसपास भारी तबाही देखी गई, जो इस बात का प्रमाण है कि अनियोजित जल परियोजनाएं आपदा को बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय राजमार्गों और अन्य सड़कों के निर्माण के लिए पहाड़ों को सीधा काटने का चलन बढ़ रहा है, जो पारंपरिक सीढ़ीनुमा कटाई के मुकाबले ज्यादा जोखिमभरा है। इसी तरह, शिमला में कमजोर ज़मीन पर बहुमंजिला इमारतों का निर्माण किया गया, जिसका नतीजा 2023 में कच्ची घाटी में हुए बड़े भूस्खलन के रूप में सामने आया। ये घटनाएं दिखाती हैं कि अवैज्ञानिक और अनियोजित निर्माण किस तरह हिमाचल को आपदा की ओर धकेल रहे हैं।
5. जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव
1980 से 2014 के बीच किन्नौर जिले में 90% जंगल गैर-वन गतिविधियों के लिए दिए गए। जंगल कटने से मिट्टी की पकड़ कमजोर होती है, जिससे मिट्टी बहने लगती है और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती हैं।
6. पर्यटन का दबाव कैसे?
हर साल लाखों पर्यटक कुल्लू, मनाली और शिमला जैसे लोकप्रिय इलाकों में घूमने के लिए आते हैं, जिससे इन क्षेत्रों पर भारी दबाव पड़ता है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नए होटल, रिजॉर्ट्स और सड़कें तेजी से बनाई जा रही हैं, जिनके लिए पहाड़ों को काटा जा रहा है और जंगलों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसके साथ ही कचरा प्रबंधन की कमी और अपर्याप्त सीवरेज सिस्टम के कारण नदियां और जल स्रोत तेजी से प्रदूषित हो रहे हैं, जिससे बाढ़ और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटन को इको-टूरिज्म के रूप में बढ़ावा देना चाहिए, ताकि प्रकृति और पर्यटन के बीच संतुलन बना रहे, लेकिन अगर यह बिना किसी ठोस योजना और नियंत्रण के किया गया तो यह खुद एक बड़ी आपदा का कारण बन सकता है।
7. नीतिगत खामियां क्या है?
हिमाचल प्रदेश में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के पीछे नीतिगत कमजोरियां भी बड़ी भूमिका निभा रही हैं। कई विकास परियोजनाओं में Environmental Impact Assessment (EIA) यानी पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन या तो ठीक से नहीं किया जाता या फिर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसका सीधा असर यह होता है कि हमें इन परियोजनाओं से जुड़े लंबी अवधि के खतरों का अनुमान नहीं लग पाता और वे धीरे-धीरे आपदा का रूप ले लेती हैं। इसके अलावा, राज्य में भले ही हिमाचल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) मौजूद है, लेकिन स्थानीय स्तर पर अलर्ट सिस्टम और बच
हाल की आपदाओं के आंकड़े
वर्ष |
मृतक |
आर्थिक नुकसान |
---|---|---|
2021 |
476 |
₹1151 करोड़ |
2022 |
276 |
₹939 करोड़ |
2023 |
404 |
₹12,000 करोड़ |
2024 |
358 |
1004 घर, 7088 पशु प्रभावित |
साल 2023 और 2024 के मानसून सीजन में हिमाचल ने सबसे ज्यादा नुकसान झेला। बादल फटने और भारी बारिश से सैकड़ों घर और सड़कें तबाह हुईं।
समाधान और सुझाव क्या है?
हिमाचल प्रदेश को बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए सुनियोजित और स्थायी उपायों की सख्त जरूरत है। सबसे पहले, हर विकास परियोजना से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को अनिवार्य और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि संभावित खतरों का सही आकलन हो सके। निर्माण कार्यों के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग आवश्यक है, जैसे सीढ़ीनुमा कटाई (Terracing) को बढ़ावा देना और इमारतों व सड़कों के निर्माण से पहले स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों की जांच करना। साथ ही, जंगलों का संरक्षण बेहद जरूरी है। इसके लिए पेड़ों की कटाई पर सख्त रोक और पुनर्वनीकरण (Reforestation) की प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए। आपदाओं से समय पर निपटने के लिए हर गांव और शहर में स्वचालित मौसम स्टेशन स्थापित किए जाएं ताकि लोगों को समय रहते चेतावनी मिल सके। पर्यटन के क्षेत्र में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिससे पर्यावरण पर दबाव कम हो और स्थायी विकास संभव हो। इसके लिए होटल, कैंपिंग और एडवेंचर टूरिज्म जैसी गतिविधियों में ग्रीन गाइडलाइंस का पालन जरूरी होना चाहिए। अंत में, स्थानीय लोगों की भागीदारी बेहद अहम है। आपदा प्रबंधन योजनाओं में उन्हें प्रशिक्षित कर शामिल किया जाए, ताकि किसी भी संकट की घड़ी में वे न सिर्फ खुद को बचा सकें, बल्कि दूसरों की भी मदद कर सकें।