पाकिस्तान की विदेश नीति पर सेना का शिकंजा ? बिना संसदीय वोटिंग के सऊदी अरब को सैनिक भेजने का लिया फैसला
punjabkesari.in Friday, Oct 09, 2026 - 06:31 PM (IST)
Pakistan Saudi Arabia Relations : यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले दखल में शामिल न होने के फैसले के ग्यारह साल बाद, पाकिस्तान अब बिना संसद में वोटिंग के सऊदी अरब और सैनिक भेजने को तैयार हो गया है। यह फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में विदेश नीति पर सेना के मजबूत असर को दिखाता है। यह बदलाव अगस्त में सऊदी अरब और तुर्की के साथ हुए रक्षा समझौते के बाद आया है, जिसे अब यमन के ईरान-समर्थित हूथी विद्रोहियों के बढ़ते हमलों के कारण लागू किया जा रहा है।
पिछले साल हुए संवैधानिक बदलावों ने मुनीर को 2030 तक सेना की सभी शाखाओं की कमान सौंप दी थी। जानकारों का मानना है कि सैनिकों की यह तैनाती जारी राजनीतिक तनाव के बीच सेना की बढ़ती ताकत को दिखाती है, खासकर इसलिए क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी का आरोप है कि सेना राजनीति में बहुत ज़्यादा दखल दे रही है। ऐतिहासिक रूप से सेना संसद के फैसलों का सम्मान करती थी लेकिन मौजूदा हालात कुछ और ही इशारा कर रहे हैं।
पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा कि इस गठबंधन के लिए ज़रूरी सरकारी प्रक्रियाओं का पालन किया गया, लेकिन ऑपरेशन से जुड़ी गोपनीयता का हवाला देते हुए कैबिनेट या संसद की भूमिका के बारे में साफ़ तौर पर कुछ नहीं बताया। यह अभी साफ नहीं है कि क्या पाकिस्तानी सैनिक हूथी विद्रोहियों के खिलाफ सीधी लड़ाई में हिस्सा लेंगे या नहीं; ऐसा होने पर ईरान के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व वाली पहलों में मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका को नुकसान पहुंच सकता है।
हूथी विद्रोहियों ने सऊदी जहाजों को धमकी दी है और हाल ही में अहम बुनियादी ढांचों को निशाना बनाया है। सऊदी और तुर्की के रक्षा अधिकारियों के साथ एक आपातकालीन बैठक के बाद यह घोषणा की गई कि वे तेजी से सैन्य क्षमताएं तैनात करेंगे हालांकि सैनिकों की संख्या या मिशन के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।
2015 में पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से यमन में सैनिक न भेजने का फ़ैसला किया था लेकिन मौजूदा हालात कानूनी बदलाव के बजाय राजनीतिक बदलाव को दिखाते हैं क्योंकि संविधान अब भी सरकार को ही सशस्त्र बलों पर नियंत्रण देता है। पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियों ने सैनिकों की तैनाती की स्थिति पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी सहयोगी सेना की स्थिति को मज़बूत कर रहे हैं, जिससे पाकिस्तान का राजनीतिक संतुलन और जटिल हो गया है।
