न खाना, न पानी, न मदद...; 438 दिन तक समंदर में भटकता रहा शख्स, दिल दहला देगी मौत को मात देने की कहानी
punjabkesari.in Sunday, Oct 25, 2026 - 05:24 PM (IST)
New York: कल्पना कीजिए, चारों तरफ समुद्र, सिर पर तपता सूरज और पीने के लिए साफ पानी तक नहीं। न कोई मदद करने वाला, न घर लौटने का रास्ता। ऊपर से अपने साथी को दम तोड़ते देखना। यह किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि एल सल्वाडोर के मछुआरे सल्वाडोर अलवरेंगा की जिंदगी का सच है, जिन्होंने प्रशांत महासागर में 438 दिन यानी करीब 14 महीने 12 दिन बिताए और आखिरकार मौत को मात देकर घर लौटे। रीडर्स डाइजेस्ट के मुताबिक, 37 वर्षीय अलवरेंगा 18 नवंबर 2012 को मैक्सिको से मछली पकड़ने निकले थे। उनके साथ 22 वर्षीय इजेकिएल कॉर्डोबा भी थे। दोनों की योजना अगले दिन लौटने की थी, लेकिन तूफान ने सब कुछ बदल दिया। तेज लहरों से नाव में पानी भरने लगा। मछली पकड़ने की रस्सियां काटनी पड़ीं और जल्द ही नाव का इंजन भी बंद हो गया। रेडियो से संपर्क टूटने के बाद तेज हवाएं उन्हें खुले समुद्र में दूर ले गईं।
कछुओं का मांस और बारिश का पानी बना सहारा
समुद्र में फंसे दोनों के सामने खाने और पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया। बारिश होने पर उन्होंने प्लास्टिक की बोतलों में पानी जमा किया। समुद्री कछुओं, मछलियों और पक्षियों को खाकर भूख मिटाई। कछुओं का मांस खाने के साथ उनका खून भी पीना पड़ा। भूख और निराशा से कॉर्डोबा की हालत बिगड़ने लगी। अलवरेंगा उन्हें हौसला देने के लिए ताजा भोजन मिलने की काल्पनिक कहानियां सुनाते थे। दोनों रात में तारों को देखते और आसमान में विमान नजर आने पर बचाए जाने की उम्मीद करते थे। लेकिन एक समुद्री पक्षी खाने के बाद कॉर्डोबा के मन में कच्चा मांस खाने का डर बैठ गया और उन्होंने भोजन लगभग छोड़ दिया।
साथी की मौत ने हिलाया
लगातार कमजोरी और निराशा के बीच कॉर्डोबा ने समुद्र में कूदकर जान देने की बात भी कही। अलवरेंगा ने उन्हें रोकने और जिंदा रहने के लिए समझाने की कोशिश की, लेकिन कुछ समय बाद कॉर्डोबा की मौत हो गई। करीब छह दिन बाद अलवरेंगा ने अपने साथी के शव को समुद्र में छोड़ दिया। वह उससे ऐसे बातें करते रहे, मानो वह अभी भी जिंदा हो।अब उन्हें अकेले ही जिंदगी की जंग लड़नी थी। शार्क के खतरे के बीच वह कभी-कभी पानी में उतरकर तैरते और समुद्री जीव पकड़ते। उन्हें अपनी बेटी फातिमा की याद आती थी। घर लौटकर उसके साथ समय बिताने की उम्मीद ही उन्हें हिम्मत देती रही।
सामने से गुजरा जहाज, फिर भी नहीं मिली मदद
कई महीने बाद एक मालवाहक जहाज उनकी नाव के करीब आया। अलवरेंगा ने चिल्लाकर मदद मांगी, लेकिन जहाज पर मौजूद लोगों के देखने और हाथ हिलाने के बावजूद वह बिना रुके आगे निकल गया। इस घटना ने उन्हें गहरा झटका दिया, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 30 जनवरी 2014 को अलवरेंगा को समुद्र में नारियल और आसमान में समुद्री पक्षी दिखाई दिए। कुछ ही देर में उन्हें दूर एक द्वीप नजर आया। वह तैरकर किनारे पहुंचे और रेत को मुट्ठी में भर लिया। यह मार्शल द्वीप समूह का एबोन एटोल था, जहां एक दंपति ने उन्हें देखा और मदद की।
करीब 11 दिन बाद वह यात्रा करने की हालत में आए और अपने देश एल सल्वाडोर लौटे। बेटी फातिमा को देखते ही उन्होंने उसे गले लगाया और रो पड़े। उन्हें दुख था कि वह बेटी के बचपन के कई साल उसके साथ नहीं बिता सके। 438 दिनों तक भूख, प्यास, तूफान और अकेलेपन से लड़ने वाले अलवरेंगा की कहानी बताती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद इंसान को संघर्ष करते रहने की ताकत दे सकती है। उनके लिए घर लौटने और बेटी से मिलने की चाह ही जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बनी।
