जर्मनी में  85 साल बाद बदला इतिहास;  AfD की जीत से चौंका यूरोप,  फ्रांस से ब्रिटेन तक बदल जाएंगे राजनीतिक समीकरण

punjabkesari.in Tuesday, Sep 08, 2026 - 01:11 PM (IST)

Berlin: जर्मनी के पूर्वी राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) की जीत ने सिर्फ देश की राजनीति ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप में नई बहस छेड़ दी है। जर्मनी में AfD की बढ़ती ताकत को यूरोप में दक्षिणपंथी राजनीति के व्यापक उभार से जोड़कर देखा जा रहा है। जर्मनी के इतिहास को देखते हुए यह नतीजा खास महत्व रखता है। नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी राजनीति को लंबे समय तक मुख्यधारा से दूर रखा गया। लेकिन 2013 में बनी AfD पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुई है।

 

अब पार्टी की सफलता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यूरोप के मतदाता पारंपरिक राजनीतिक दलों से नाराज होकर दक्षिणपंथी विकल्पों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। करीब 85 साल बाद जर्मनी की राजनीति उस मोड़ पर खड़ी है, जहां इतिहास और वर्तमान आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध और नाजी शासन के बाद जर्मनी ने कट्टर दक्षिणपंथ से दूरी बनाए रखी, लेकिन अब पूर्वी जर्मनी में AfD की जबरदस्त चुनावी कामयाबी ने उसी राजनीतिक विचारधारा को सत्ता के करीब पहुंचा दिया है। इस बदलाव ने जर्मन समाज से लेकर यूरोपीय राजनीति तक हलचल मचा दी है।

 

महंगाई और इमिग्रेशन बने बड़ा मुद्दा
यूरोप के कई देशों में महंगाई, बढ़ती जीवन-यापन लागत, रोजगार और इमिग्रेशन जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। दक्षिणपंथी पार्टियां इन्हीं मुद्दों को लेकर मौजूदा सरकारों पर हमला कर रही हैं। इन दलों का तर्क है कि पारंपरिक पार्टियां आम लोगों की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रही हैं। यही नाराजगी दक्षिणपंथी दलों के लिए नए मतदाताओं का आधार तैयार कर रही है।आने वाले चुनावों में फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और स्पेन जैसे देशों में भी इन मुद्दों का असर दिखाई दे सकता है।

 

फ्रांस में ले पेन की बढ़ती दावेदारी
फ्रांस में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन की स्थिति पर पूरे यूरोप की नजर है। अगले राष्ट्रपति चुनाव में वह एक बार फिर मैदान में उतरने की तैयारी में हैं और उनकी स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत मानी जा रही है। हालांकि उनकी जीत तय नहीं मानी जा सकती। अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट दल मजबूत उम्मीदवार के पीछे एकजुट होते हैं, तो ले पेन को कड़ी चुनौती मिल सकती है। लेकिन अगर मध्यमार्गी वोट कई उम्मीदवारों में बंटता है, तो दक्षिणपंथ के लिए रास्ता आसान हो सकता है। फ्रांस में दक्षिणपंथी सरकार बनने का असर सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। फ्रांस यूरोपीय संघ की प्रमुख राजनीतिक और सैन्य शक्तियों में शामिल है और उसके पास परमाणु हथियार भी हैं। इसलिए वहां सत्ता परिवर्तन का असर पूरे यूरोप पर पड़ सकता है।

 

ब्रिटेन में नाइजल फराज की पार्टी को फायदा
ब्रिटेन में भी पारंपरिक पार्टियों के सामने दक्षिणपंथी चुनौती बढ़ी है। नाइजल फराज की अगुआई वाली Reform UK ने हाल के स्थानीय चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया और बड़ी पार्टियों को चुनौती दी। इससे संकेत मिला कि पारंपरिक कंजरवेटिव और लेबर पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि दक्षिणपंथी खेमे के भीतर भी एकजुटता नहीं है। पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव के अलग होकर नई दक्षिणपंथी पार्टी बनाने से भविष्य में वोटों के बंटने की संभावना भी पैदा हुई है।
 

मेलोनी ने दिखाया दक्षिणपंथ का दूसरा मॉडल
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप के दक्षिणपंथी नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। उनकी सरकार ने लंबे समय तक सत्ता में बने रहने में सफलता हासिल की है। मेलोनी की राजनीति में इमिग्रेशन और राष्ट्रीय पहचान जैसे मुद्दों को प्रमुखता मिली है। हालांकि उनकी सरकार के सामने भी चुनौती यह है कि उनसे ज्यादा सख्त दक्षिणपंथी रुख रखने वाले नेता उनके मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित न कर लें।

 

हंगरी ने दिखाया अलग तस्वीर
यूरोप में दक्षिणपंथ के बढ़ते प्रभाव की कहानी का दूसरा पहलू हंगरी है। लंबे समय तक सत्ता में रहे विक्टर ओर्बान को चुनाव में बड़ा झटका लगा और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। ओर्बान सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था, महंगाई और यूरोपीय संघ के साथ टकराव जैसे मुद्दों पर नाराजगी सामने आई। हंगरी का उदाहरण बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दे किसी सरकार की जीत की गारंटी नहीं हैं। अगर सरकार महंगाई, रोजगार और आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं से निपटने में असफल रहती है, तो लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद मतदाता उसे बाहर कर सकते हैं।


यूरोप के लिए क्या संकेत?
जर्मनी में AfD की सफलता निश्चित रूप से यूरोप की राजनीति में दक्षिणपंथ के बढ़ते प्रभाव का एक महत्वपूर्ण संकेत है। फ्रांस में ले पेन, ब्रिटेन में फराज और इटली में मेलोनी जैसे नेताओं की मौजूदगी इस बदलाव को और स्पष्ट करती है। लेकिन हंगरी का उदाहरण यह भी दिखाता है कि यूरोपीय राजनीति में तस्वीर एकतरफा नहीं है। कहीं दक्षिणपंथी दल मजबूत हो रहे हैं, तो कहीं मतदाता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रहे हैं।  यूरोप की अगली राजनीतिक लड़ाई में महंगाई, इमिग्रेशन, रोजगार, राष्ट्रीय पहचान और पारंपरिक पार्टियों से नाराजगी जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
 


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Content Writer

Tanuja

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