चीन की अर्थव्यवस्था में बड़ी कमजोरी; दुनिया पर कब्जे की रणनीति ड्रैगन पर पड़ रही भारी, निर्यात बढ़ा फिर भी कंपनियां घाटे में
punjabkesari.in Saturday, Oct 24, 2026 - 12:08 PM (IST)
Bejing: चीन के औद्योगिक उत्पादन और निर्यात की ताकत दुनिया भर के देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। अमेरिका समेत कई देशों के नीति-निर्माताओं को आशंका है कि चीनी सामान की बाढ़ उनके घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंचा सकती है, रोजगार घटा सकती है और महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए उन्हें चीन पर निर्भर बना सकती है। लेकिन चीन की औद्योगिक ताकत के पीछे एक विरोधाभास भी उभर रहा है। देश की कई फैक्ट्रियां बड़े पैमाने पर उत्पादन और निर्यात करने के बावजूद मुनाफा कमाने में नाकाम हो रही हैं। लंदन स्थित शोध संस्था कैपिटल इकोनॉमिक्स के अनुसार, चीन की उन औद्योगिक कंपनियों का अनुपात, जो घाटे में चल रही हैं, 2018 के मुकाबले दोगुना होकर इस साल 30 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यानी औद्योगिक क्षेत्र की करीब हर तीन में से एक कंपनी नुकसान उठा रही है।
चीन की कंपनियों के लिए समस्या यह है कि निर्यात बढ़ने के बावजूद उनका घाटा जमा होता जा रहा है। उत्पादन और बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की होड़ के बीच कई कंपनियां पर्याप्त मुनाफा नहीं कमा पा रही हैं। स्थानीय प्रशासन रोजगार बनाए रखने और आर्थिक विकास के निर्धारित लक्ष्य पूरे करने के लिए घाटे में चल रहे उद्यमों को नियमित रूप से आर्थिक सहारा देता है। इससे ऐसी कंपनियां भी कारोबार जारी रख पाती हैं, जिन्हें सामान्य बाजार परिस्थितियों में बंद होना पड़ सकता था। इस व्यवस्था का एक उलटा असर सामने आ रहा है। चीन को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई औद्योगिक नीति अब उसकी अर्थव्यवस्था को दूसरे देशों की नीतियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना रही है। जब विदेशी बाजार चीनी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाते हैं या आयात सीमित करते हैं, तो निर्यात पर निर्भर कंपनियों के लिए मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
मुनाफे से ज्यादा उत्पादन और रोजगार पर जोर
चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की आर्थिक प्राथमिकताओं में कंपनियों का मुनाफा हमेशा सबसे ऊपर नहीं रहा है। देश के आर्थिक योजनाकारों का मानना रहा है कि विशाल विनिर्माण क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा, तकनीकी प्रगति, राजनीतिक स्थिरता और वैश्विक प्रभाव के लिए जरूरी है। इसी सोच के तहत कारखानों से होने वाले उत्पादन, निर्यात और रोजगार को निवेश पर मिलने वाले वित्तीय लाभ से अधिक महत्व दिया जाता रहा है। इस रणनीति के कारण चीन की अर्थव्यवस्था में ऐसी कंपनियों की मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई है, जिन्हें 'जॉम्बी कंपनियां' कहा जाता है। ये ऐसी कंपनियां होती हैं, जो प्रभावी रूप से दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच चुकी होती हैं, लेकिन कर्ज देने वाले संस्थानों और अन्य वित्तीय सहायता के सहारे अपना कारोबार जारी रखती हैं। ऐसी कंपनियों के बने रहने से रोजगार और उत्पादन को तत्काल सहारा मिल सकता है, लेकिन लंबे समय तक संसाधनों का इस्तेमाल कम उत्पादक उद्यमों में होता रहता है। इससे नई और अधिक कुशल कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना भी कठिन हो सकता है।
चीन की औद्योगिक ताकत के सामने चुनौती
चीन की विशाल उत्पादन क्षमता उसे वैश्विक बाजारों में मजबूत स्थिति देती है। कारों, चिप और अन्य औद्योगिक उत्पादों के निर्यात से उसकी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति बढ़ती है। लेकिन उत्पादन की मात्रा और वास्तविक आर्थिक लाभ के बीच अंतर उसकी औद्योगिक नीति के सामने चुनौती बनता जा रहा है। यदि कंपनियां लगातार घाटे में रहती हैं और उन्हें सरकारी या वित्तीय सहायता के सहारे चलाना पड़ता है, तो इस मॉडल की दीर्घकालिक आर्थिक लागत बढ़ सकती है। वहीं, विदेशी बाजारों में व्यापारिक प्रतिबंध बढ़ने से उन कंपनियों पर दबाव और गहरा हो सकता है, जो निर्यात पर निर्भर हैं।
