बांग्लादेश की जेलों में 2026 में 132 कैदियों की मौत, स्वास्थ्य सुविधाओं पर उठे सवाल
punjabkesari.in Saturday, Sep 26, 2026 - 01:00 PM (IST)
ढाका : बांग्लादेश की जेलों में वर्ष 2026 के पहले साढ़े आठ महीनों में कम से कम 132 कैदियों की मौत हो चुकी है। इन मौतों ने जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं, ज्यादा कैदियों की संख्या और हिरासत में रखे लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेल जाने वाले व्यक्ति के लिए सजा का मतलब अपनी आजादी खोना होता है, लेकिन कई परिवारों के लिए जेल में बंद रिश्तेदार की मौत उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बन जाती है। आधिकारिक बयानों और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, देश की अलग-अलग जेलों में लगभग हर दिन कैदियों की मौत की खबर सामने आ रही है। कुछ दिनों में चार तक मौतें भी दर्ज की गई हैं।
बांग्लादेश के पूर्व जेल महानिरीक्षक ब्रिगेडियर जनरल सैयद मोहम्मद मोताहर हुसैन ने 18 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि जेलों में इलाज को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि 2026 में उस समय तक 122 कैदियों की मौत हो चुकी थी, जबकि 122 अन्य कैदियों का ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल और बांग्लादेश मेडिकल यूनिवर्सिटी सहित अलग-अलग बड़े अस्पतालों में इलाज चल रहा था। उन्होंने यह भी बताया कि 2025 में बीमारी के कारण 187 कैदियों की मौत हुई थी। हालांकि, मानवाधिकार संगठन ऐन ओ सालिश केंद्र (ASK) के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी से अगस्त के बीच 79 कैदियों की मौत हुई। इनमें 47 ऐसे लोग थे, जिनके मामलों की सुनवाई अभी चल रही थी, जबकि 32 दोषी ठहराए जा चुके कैदी थे। सबसे ज्यादा 44 मौतें ढाका डिवीजन में दर्ज की गईं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर के पहले 15 दिनों में ही कम से कम 10 कैदियों की बीमारी से मौत हुई। इससे 2026 में अब तक सामने आई मौतों की संख्या कम से कम 132 हो गई है। हाल ही में मोहम्मद रफीकुल इस्लाम (54) और अब्दुर रहीम (60) की ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मौत हुई। इससे एक दिन पहले ढाका सेंट्रल जेल में बंद अब्दुल बरेक और अब्दुल माबूद की भी मौत हो गई थी। अलग-अलग आंकड़ों में अंतर रिपोर्टिंग की अवधि और स्रोत अलग होने के कारण हो सकता है। हालांकि, लगातार सामने आ रही मौतों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि जब कोई कैदी गंभीर रूप से बीमार होता है तो उसे कितनी जल्दी इलाज मिलता है और क्या उसके परिवार को समय पर जानकारी दी जाती है।
एक सप्ताह में स्वस्थ कैदी की मौत
मगुरा के दोषी कैदी नूर आलम मुंशी का मामला इन सवालों को और गंभीर बनाता है। उसके भाई ताहेर मुंशी ने प्रेसेंजा से कहा कि नूर आलम बिल्कुल स्वस्थ था और जिला जेल गया था, लेकिन एक सप्ताह के अंदर उसका शव ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मोर्चरी से मिला। मगुरा शहर के विटाशैर इलाके के रहने वाले नूर आलम को 8 सितंबर को ड्रग्स से जुड़े एक मामले में सजा मिलने के बाद जेल भेजा गया था। परिवार के अनुसार उसका किसी राजनीतिक गतिविधि से कोई संबंध नहीं था। जेल अधिकारियों के मुताबिक 13 सितंबर को नूर आलम की अचानक तबीयत खराब हुई। पहले उसे मगुरा के अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद उसे इलाज के लिए खुलना और फिर ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजा गया, जहां मंगलवार शाम उसकी मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि नूर आलम की हालत बिगड़ने और उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने की जानकारी उन्हें समय पर नहीं दी गई। परिवार यह जानना चाहता है कि जेल जाने के कुछ ही दिनों बाद स्वस्थ व्यक्ति की हालत इतनी गंभीर कैसे हो गई और उन्हें समय पर सूचना क्यों नहीं दी गई।
मानवाधिकार संगठन ने जांच की मांग की
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जेल में होने वाली हर मौत की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। ASK के वरिष्ठ समन्वयक अबू अहमद फैजुल कबीर ने प्रेसेंजा से कहा कि कैदियों से उनकी आजादी छीनी जा सकती है, लेकिन उनके मानवीय सम्मान और मौलिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता। उनके मुताबिक कैदी हिरासत में हैं, इसलिए उनकी जिंदगी, स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की है। उन्होंने कहा कि जेल में होने वाली हर मौत को लापरवाही का नतीजा नहीं माना जा सकता, लेकिन जब मौतों की संख्या असामान्य रूप से बढ़ती है तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। उन्होंने हर मौत की स्वतंत्र जांच की मांग की, जिसमें कैदी को मिले इलाज, सुरक्षा व्यवस्था और जेल अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो।
जेलों में डॉक्टरों और नर्सों की भारी कमी
ढाका विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर एंड रिसर्च के एसोसिएट प्रोफेसर और क्रिमिनोलॉजिस्ट डॉ. तौहीदुल हक के मुताबिक जेलों में ज्यादा कैदी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और भोजन की खराब गुणवत्ता मानवाधिकार से जुड़े बड़े मुद्दे हैं। उन्होंने कहा कि कैदियों को सजा पूरी करने के बाद समाज में वापस आने के लिए सुधार और पुनर्वास के पर्याप्त अवसर भी मिलने चाहिए। जेलों में मेडिकल स्टाफ की कमी भी बड़ी समस्या है। जेल स्वास्थ्य विभाग के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अख्तर हसीब देवान के मुताबिक बांग्लादेश में 68 जेल हैं। इनमें मेडिकल अधिकारियों के 151 पद स्वीकृत हैं, लेकिन पूरे जेल सिस्टम में फिलहाल केवल दो डॉक्टर काम कर रहे हैं। ये दोनों स्वास्थ्य मंत्रालय या स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय से प्रतिनियुक्ति पर आए हैं। नर्सों के लिए 103 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें केवल 32 पदों पर कर्मचारी हैं। 55 अन्य पदों पर भर्ती की प्रक्रिया लोक सेवा आयोग के जरिए चल रही है। फार्मासिस्ट के 73 स्वीकृत पदों में से 68 पद भरे हुए हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य सहायकों और लैब टेक्नीशियन की भी कमी है।
देवान ने कहा कि जेल प्रशासन हर ऐसी मौत को रोकना चाहता है, जिसे रोका जा सकता है, लेकिन स्टाफ की कमी बड़ी चुनौती है। जेल विभाग ने स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल का पद बनाया है। इसके अलावा कुछ जेल कर्मचारियों को बांग्लादेश सेना और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश की संबंधित शाखाओं के जरिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की ट्रेनिंग दी जा रही है। हालांकि, गंभीर बीमारी की स्थिति में जेल कर्मचारियों की सामान्य मेडिकल ट्रेनिंग डॉक्टरों, नर्सों, जांच सुविधाओं और इमरजेंसी मेडिकल टीम की जगह नहीं ले सकती।
कैदियों के इलाज की जिम्मेदारी राज्य की
ASK के फैजुल कबीर का कहना है कि डॉक्टरों या अस्पतालों की कमी कुछ समस्याओं की वजह हो सकती है, लेकिन इससे राज्य की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। अगर कोई कैदी गंभीर रूप से बीमार होता है तो जेल अधिकारियों को समय पर अस्पताल पहुंचाने, इमरजेंसी इलाज, दवाइयों और सही एंबुलेंस की व्यवस्था करनी चाहिए। अगर इलाज में देरी या उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के बाद किसी कैदी की मौत होती है तो पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। यह मामला केवल जेल प्रशासन तक सीमित नहीं है। सरकारी हिरासत में रहने वाले कैदी खुद डॉक्टर, अस्पताल या इलाज की जगह का चुनाव नहीं कर सकते। उनकी आवाजाही और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सरकारी अधिकारियों के नियंत्रण में रहती है। ऐसे में उनकी जान और स्वास्थ्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी राज्य पर ज्यादा होती है। जेल में किसी रिश्तेदार की मौत के बाद परिवारों की मांग साफ है। वे जानना चाहते हैं कि उनके परिजन की मौत कैसे हुई, क्या उन्हें सही समय पर इलाज मिला और क्या उनकी मौत को रोका जा सकता था। सिर्फ आंकड़े इन सवालों का जवाब नहीं दे सकते। इसके लिए पारदर्शी जांच, पर्याप्त मेडिकल स्टाफ और गंभीर बीमार कैदियों को समय पर इमरजेंसी इलाज देना जरूरी है, ताकि जेल की सजा लापरवाही और इलाज की कमी की वजह से जिंदगी की सजा न बन जाए।
