यहां मुखौटा नृत्य से होता है शत्रुओं का नाश

punjabkesari.in Saturday, Jun 27, 2015 - 10:09 AM (IST)

केलांग: लाहौल के ऐतिहासिक शाशुर गोम्पा में गाहर घाटी के कारदंग, लापचांग, पिंयूकर, तायुल तथा बोकर गोम्पा के लामा गणों ने शुक्रवार को शाशुर छेशु का त्यौहार धार्मिक उत्साह व हर्षोल्लास से मनाया। यह बौद्ध मठ गाहर घाटी के वशिष्ठ समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

गाहर घाटी में बौद्ध मठों के इर्दगिर्द सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां घूमती हैं। पश्चिम हिमालय के प्रसिद्ध इतिहासकार छेरिंग दोरजे के अनुसार छम्म नृत्य की उत्पत्ति 9वीं शताब्दी में तिब्बत में बौद्ध धर्म के कट्टर दुश्मन एवं महाअत्याचारी राजा लंगधर्मा के वध के बाद शुरू हुई। उन्होंने बताया कि कोठी गुमरंग के ठाकुर देवी चंद ने वर्ष 1860 में सर्वप्रथम जास्कर के वरदांग गोम्पा के छम्म नर्तकों को लाहौल बुलाकर छम्म का शुभारंभ करवाया। अंग्रेजों के समय से इसी माह निभाई जा रही परम्परा आज तक कायम है।

शाशुर छेशु का महत्व
शाशुर छेशु बौद्ध सम्प्रदाय के लिए विशेष महत्व रखता है तथा यह कबायली उत्सव कबायली लोगों के लिए खुशियां तथा उमंग लेकर आता है। केलांग से ठीक ऊपर टीले पर उपस्थित शाशुर गोम्पा में शुक्रवार को लाहौल घाटी के हजारों बौद्ध श्रद्धालुओं ने इस पावन तीर्थ स्थल पर एकत्र होकर छेशु एवं मुखौटा नृत्य का भरपूर आनंद लिया। धाॢमक मुखौटा नृत्य अथवा छम्म अच्छाई की बुराई पर जीत तथा बौद्ध विरोधी तत्वों व प्रवृत्तियों को दूर भगाने के मकसद से आयोजित किया जाता है।

ऐसे होता है यह नृत्य
महाबौद्धी सोसायटी के महासचिव लामा नवांग उपासक ने बताया कि महाकाल शाशुर छेशु का मुख्य छम्म नृत्य है, जिसका एक दिन पूर्व अभ्यास किया जाता है, जिसे छम्मजांग कहा जाता है। उन्होंने बताया कि सभी छम्म नर्तक सिर पर विचित्र टोपी, हाथों में अद्भुत हथियार और मुखौटे पहनकर मंजीरा आदि बजाते हुए चक्राकार गति से पीछे मुड़ते, हटते, झुकते, शरीर एवं अंगों के भाव-भंगिमाओं का मनोरम नजारा पेश करते हैं।

यह है मान्यता
छम्म नर्तकों की सभी धार्मिक क्रियाएं धर्म ग्रंथों में वर्णित नियमों के अनुसार निष्पक्ष की जाती हैं। इस दौरान काली टोपी पहनकर जनग नृत्य का भी प्रदर्शन किया जाता है। मान्यता है कि जनग नर्तकों में झंकार शत्रुओं का नाश करते हैं तथा परोपकारी प्रवृत्तियों का बोलबाला हो जाता है।


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