काली साड़ी पहन नेशनल अवार्ड लेने पहुंची Yami Gautam, लगीं बेहद खूबसूरत...महारानी अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी है साड़ी की कहानी
punjabkesari.in Thursday, Sep 24, 2026 - 07:19 PM (IST)
Yami Gautam : एक्ट्रेस यामी गौतम ने पारंपरिक भारतीय कारीगरी को अपनाया और एक शानदार काली महेश्वरी साड़ी पहनी, जिसमें पारंपरिक हैंडलूम की सुंदरता और विरासत की झलक दिखी।
इंस्टाग्राम पर अपनी हालिया पोस्ट में, 'बाला' फिल्म की एक्ट्रेस ने बताया कि यह साड़ी महेश्वर के साल्वी परिवार के सातवीं पीढ़ी के बुनकर ने बुनी थी, जो हैंडलूम कारीगरी की पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यह साड़ी सिल्क, कॉटन और ज़री का इस्तेमाल करके बनाई गई थी।
पारंपरिक बुनाई के बारे में जानकारी देते हुए, एक्ट्रेस ने महेश्वरी हैंडलूम के इतिहास और उन कारीगरों की पीढ़ियों पर प्रकाश डाला जिन्होंने इस कला को बचाए रखने में मदद की है। एक्ट्रेस ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस कला की सुंदरता उन कारीगरों के हाथों में है जिन्होंने बुनाई की परंपरा को पीढ़ियों से जीवित रखा है।
अपनी कई तस्वीरें शेयर करते हुए उन्होंने लिखा, "काली महेश्वरी साड़ी महेश्वर के साल्वी परिवार के सातवीं पीढ़ी के बुनकर ने बुनी है, जो हैंडलूम कारीगरी की पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। इसे सिल्क, कॉटन और जरी से बुना गया है। महेश्वरी बुनाई को महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बढ़ावा दिया था, जो कुशल बुनकरों को महेश्वर लाई थीं। इसकी सुंदरता उन हाथों में है जिन्होंने इस कला को पीढ़ियों से जीवित रखा है। तस्वीरों में, काबिल फिल्म की एक्ट्रेस काली साड़ी में खुशमिजाज पोज देती दिख रही हैं, जिस पर किनारों पर सुनहरी कढ़ाई की गई है। उन्होंने साड़ी के साथ मैचिंग इयररिंग्स पहने और बालों का हाई बन बनाया। अपने लुक को और बेहतर बनाने के लिए उन्होंने हल्का मेकअप किया। अपने लुक के जरिए यामी ने महेश्वरी हैंडलूम की कलाकारी और विरासत का जश्न मनाया और साथ ही पारंपरिक साड़ी के पीछे की कारीगरी की ओर ध्यान आकर्षित किया।
खास बात यह है कि यामी गौतम ने 'आर्टिकल 370' में अपनी परफॉर्मेंस के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड लेते समय भी यही काली महेश्वरी साड़ी पहनी थी। 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स 22 सितंबर को गुजरात के केवड़िया में आयोजित किए गए थे।
जानकारी के लिए बता दें कि महेश्वरी बुनाई एक पारंपरिक हैंडलूम कला है जिसकी शुरुआत मध्य प्रदेश के महेश्वर में हुई थी। 18वीं सदी में होल्कर वंश की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस कला को बढ़ावा दिया। उन्होंने शाही मेहमानों के लिए खास साड़ियां बनवाने के लिए सूरत और दक्षिण भारत से कुशल बुनकरों को बुलाया था।
