Rajpal Yadav पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 2 करोड़ जमा करने का आदेश, जेल की सजा बढ़ाने के भी दिए संकेत
punjabkesari.in Wednesday, Oct 07, 2026 - 01:51 PM (IST)
Rajpal Yadav Case : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक्टर और कॉमेडियन राजपाल यादव को निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में 1.15 करोड़ रुपये जमा करें। उनके वकील ने बताया कि यह रकम तुरंत जमा करने के लिए तैयार है, जबकि बाकी 85 लाख रुपये उनकी पुश्तैनी संपत्ति के एक संभावित खरीदार के जरिए जुटाए जाएंगे। यह सब कई चेक बाउंस मामलों के सिलसिले में 2 करोड़ रुपये चुकाने की व्यवस्था के तहत किया जा रहा है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच यादव और उनकी पत्नी राधा यादव की उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने 'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट' के तहत सात चेक बाउंस मामलों में उनकी सजा को बरकरार रखा था।
सुनवाई के दौरान, CJI कांत की अगुवाई वाली बेंच को बताया गया कि यादव ने डिमांड ड्राफ्ट के जरिए 1.15 करोड़ रुपये का इंतजाम कर लिया है, जबकि उनकी पुश्तैनी संपत्ति के एक संभावित खरीदार, जो कोर्ट में मौजूद थे, बाकी 85 लाख रुपये एडवांस के तौर पर देने को तैयार थे। यादव के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि खरीदार पितृ पक्ष की वजह से अभी बिक्री के दस्तावेज रजिस्टर नहीं कराना चाहता और नवरात्रि शुरू होने के बाद रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहता है।
वकील ने आगे कहा कि खरीदार सोमवार को डिमांड ड्राफ्ट के जरिए 85 लाख रुपये जमा करने को तैयार है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सौदे की कुल कीमत पर सवाल उठाया और कहा कि देनदारी 2 करोड़ रुपये से काफी ज्यादा है।
CJI कांत की अगुवाई वाली बेंच ने पूछा, "बिक्री की कुल कीमत क्या होगी ? क्योंकि देनदारी 2 करोड़ रुपये से कहीं ज्यादा है। वकील ने कहा कि संपत्ति की कीमत 30 करोड़ रुपये से ज्यादा है और पुष्टि की कि संभावित खरीदार के पास प्रस्तावित भुगतान करने की क्षमता है। शिकायतकर्ता के वकील ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई और कहा कि अगर तुरंत 2 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया जाता है, तो यादव को बाकी रकम चुकाने के लिए अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। CJI कांत की अगुवाई वाली बेंच ने सुझाव दिया कि 1.15 करोड़ रुपये तुरंत जमा किए जाएं और बाकी 85 लाख रुपये सोमवार को ट्रांसफर किए जाएं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट बाकी रकम के भुगतान के लिए एक शेड्यूल तय करेगा।
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों का पालन करने में यादव के व्यवहार पर नाराजगी जताई और संकेत दिया कि वह उनकी तीन महीने की जेल की सजा को बढ़ाकर दो साल करने पर विचार कर रहा है।
जस्टिस बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट यादव के व्यवहार से संतुष्ट नहीं है और उन्हें दी जा रही रियायत का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि शिकायतकर्ता को पैसे वापस मिल जाएं।
सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा आदेश तब आया जब 5 अक्टूबर को कोर्ट ने पाया कि 15 सितंबर के उसके निर्देश का पालन नहीं किया गया था। उस समय, CJI कांत की बेंच ने देखा था कि 50 लाख रुपये के कथित डिमांड ड्राफ्ट की फोटोकॉपी पेश की गई थी और दावा किया गया था कि ड्राफ्ट अगले दिन दिल्ली पहुंच जाएगा। तब सुप्रीम कोर्ट ने यादव को कुल 2 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आखिरी मौका दिया था और मामले की सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय की थी।
15 सितंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने यादव को कम से कम 2 करोड़ रुपये जमा करने का आखिरी मौका देते हुए दो हफ्ते का समय दिया था, क्योंकि कोर्ट ने पाया था कि 5 करोड़ रुपये जमा करने के उसके पहले के निर्देश का पालन नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट, यादव और उनकी पत्नी राधा राजपाल यादव की उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है जिनमें दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें 'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट' के तहत चेक बाउंस होने के सात मामलों में उनकी सजा को बरकरार रखा गया था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 जुलाई को यादव की सजा को बरकरार रखा था, लेकिन सात मामलों में से हर एक में उनकी सजा को छह महीने से घटाकर तीन महीने की साधारण कैद कर दिया था। कोर्ट ने हर मामले में जुर्माना भी 1.60 करोड़ रुपये से घटाकर 1.05 करोड़ रुपये कर दिया था और मुख्य सजाओं को एक साथ चलाने का निर्देश दिया था।
हाई कोर्ट ने कार्यवाही के दौरान यादव द्वारा शिकायतकर्ता, M/s मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को पहले ही किए गए भुगतान को भी ध्यान में रखा था। यादव और उनकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में इस फ़ैसले को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि निचली अदालतों ने दोनों पक्षों के बीच बाद में हुए सहमति समझौते पर ठीक से विचार नहीं किया।
याचिकाकर्ताओं ने 'M/s गिम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मनोज गोयल' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि दोनों पक्षों के बीच बाद में हुए समझौते से मूल शिकायत की कार्यवाही खत्म हो जानी चाहिए थी।
