आज़ाद भारत रिव्यू: महिला क्रांतिकारियों की अनकही गाथा, रूपा अय्यर का शानदार निर्देशन

punjabkesari.in Friday, Jan 02, 2026 - 02:40 PM (IST)

फिल्म रिव्यू: आज़ाद भारत (AZAD BHARAT)
रूपा अय्यर (Rupa Iyer), इंदिरा तिवारी (Indira Tiwari), डॉ. सुभाष चंद्र (Dr. Subhash Chandra), प्रियांशु चटर्जी (Priyanshu Chatterjee), सुचेंद्र प्रसाद (Suchendra Prasad)
निर्देशक: रूपा अय्यर (Rupa Iyer)
रेटिंग: 3 स्टार्स 

AZAD BHARAT: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती माह में रिलीज़ हुई पीरियड ड्रामा फ़िल्म ‘आजाद भारत’ का निर्देशन रूपा अय्यर ने किया है। यह फ़िल्म आज़ाद हिंद फ़ौज की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें खास तौर पर उसकी महिला इकाई रानी झांसी रेजिमेंट (रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट) को केंद्र में रखा गया है। फ़िल्म भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला क्रांतिकारी नीरा आर्या के जीवन पर आधारित है और नए साल पर सिनेमाघरों में यह देशभक्ति से ओतप्रोत एक खास सिनेमाई अनुभव बनकर उभरी है।

कहानी 
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई वीरांगनाओं का अहम योगदान रहा है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नीरा आर्या जैसी क्रांतिकारी का नाम अपेक्षाकृत कम जाना गया। फ़िल्म ‘आजाद भारत’ इसी गुमनाम नायिका की दिल दहला देने वाली सच्ची कहानी को पर्दे पर लाती है।

नीरा आर्या, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज की सक्रिय सदस्य थीं। कहानी उस मोड़ पर और भी तीव्र हो जाती है जब अंग्रेज़ सरकार के लिए काम करने वाला सीआईडी इंस्पेक्टर—नीरा का अपना पति श्रीकांत—नेताजी के लिए खतरा बन जाता है। देश के प्रति अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखते हुए नीरा अपने पति को मार देती है।

फ़िल्म सुभाष चंद्र बोस की रणनीतियों के साथ-साथ नीरा आर्या के संघर्ष, यातनाओं और बलिदान को प्रभावी ढंग से दर्शाती है। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आज़ादी के लिए दी गई सर्वोच्च कुर्बानी की गाथा है।

अभिनय 
नीरा आर्या की मुख्य भूमिका में रूपा अय्यर ने बेहद दमदार अभिनय किया है। उनके चेहरे के भाव, आक्रोश, दर्द और अडिग साहस दर्शकों को गहराई से प्रभावित करते हैं। अंग्रेज़ों के अत्याचार सहते हुए भी नीरा का न टूटना, रूपा के अभिनय की ताकत को दर्शाता है। विशेष रूप से वह दृश्य याद रह जाता है, जब वह अपने पति को मारते हुए कहती हैं—“तुम जैसे अंग्रेज़ों के कुत्ते के हाथ में नेताजी कभी नहीं आने वाले।” यह भूमिका चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन रूपा अय्यर की मेहनत और तैयारी साफ़ झलकती है। इस किरदार के लिए वह निश्चित रूप से पुरस्कार की हकदार हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रूप में श्रेयस तलपड़े ने भी गहरी छाप छोड़ी है। उनके अभिनय में गंभीरता, संयम और नेतृत्व स्पष्ट नज़र आता है। उनका यह संवाद— “नारी जब ठान ले, उसे कोई नहीं रोक सकता… मुझे नाज़ है हिंद की नारी पर।” दर्शकों में जोश भर देता है।

सरस्वती राजामणि के किरदार में इंदिरा तिवारी का अभिनय सराहनीय है, वहीं छज्जूराम के रूप में सुरेश ओबेरॉय ने भी अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है।

निर्देशन
निर्देशक रूपा अय्यर ने हर मोर्चे पर खुद को साबित किया है। एक गुमनाम क्रांतिकारी की कहानी को पर्दे पर उतारना बड़ी जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने गहन रिसर्च और संवेदनशीलता के साथ निभाया है।
फ़िल्म वास्तविक घटनाओं पर आधारित होते हुए भी कहानी में मौजूद ट्विस्ट और टर्न दर्शकों को बांधे रखते हैं। ट्रेनिंग सीन जोश और जज़्बे से भरे हुए हैं, वहीं थ्रिल से भरपूर दृश्य रोंगटे खड़े कर देते हैं।

फ़िल्म के संवाद बेहद प्रभावशाली हैं, जैसे-“प्रेम ही करना हो तो अपने देश से करो… स्वतंत्रता किसी एक के लिए नहीं, पूरे भारत के लिए है।” या “क्रांति की तलवार बम या बंदूक पर नहीं, विचारों की धार पर तेज की जाती है।”
बैकग्राउंड म्यूज़िक कहानी की गति के साथ पूरी तरह तालमेल बैठाता है। फ़िल्म का गीत ‘जय हो’ देशभक्ति की भावना को और भी प्रबल करता है।

 

 

 


 


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Content Editor

Jyotsna Rawat

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