स्वामी प्रभुपाद : क्यों भगवान को नहीं पड़ती ब्रह्मांड का भार उठाने के लिए कंधों की जरूरत ?
punjabkesari.in Sunday, Jan 04, 2026 - 05:05 PM (IST)
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।।9.5।।
अनुवाद एवं तात्पर्य : तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न सारी वस्तुएं मुझमें स्थित नहीं रहतीं। जरा मेरे योग ऐश्वर्य को देखो। यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक (भर्ता) हूं और सर्वत्र व्याप्त हूं लेकिन मैं इस दृश्यजगत का अंश नहीं हूं क्योंकि मैं सृष्टि का कारणस्वरूप हूंं। भगवान का कथन है कि सब कुछ उन्हीं पर आश्रित है (मत्स्थानि सर्वभूतानि) इसका अन्य अर्थ नहीं लगाना चाहिए। भगवान इस भौतिक जगत के पालन तथा निर्वाह के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं हैं। कभी-कभी हम एटलस (एक रोमन देवता) को अपने कंधों पर गोला उठाए देखते हैं, वह अत्यंत थका लगता है और इस विशाल पृथ्वीलोक को धारण किए रहता है।
हमें किसी ऐसे चित्र को मन में नहीं लाना चाहिए जिसमें कृष्ण इस सृजित ब्रह्मांड को धारण किए हुए हों। उनका (कृष्ण) कहना है कि यद्यपि सारी वस्तुएं उन पर टिकी हैं किन्तु वे पृथक रहते हैं। सारे लोक अंतरिक्ष में तैर रहे हैं और यह अंतरिक्ष परमेश्वर की शक्ति है किन्तु वे अंतरिक्ष से भिन्न हैं, वे पृथक स्थित हैं। अत: भगवान कहते हैं यद्यपि ये सब रचित पदार्थ मेरी अकल्पनीय शक्ति पर टिके हैं किन्तु भगवान के रूप में मैं उनसे पृथक रहता हूं। यह भगवान का अचिन्त्य ऐश्वर्य है।
भगवान इसी तथ्य को समझाते हैं, यद्यपि वे समस्त सृष्टि के पालन तथा धारणकर्ता हैं किन्तु वे इस सृष्टि को स्पर्श नहीं करते। केवल उनकी परम इच्छा से प्रत्येक वस्तु का सृजन, धारण, पालन एवं संहार होता है। उनके मन और स्वयं उनमें कोई भेद नहीं है जैसा हमारे भौतिक मन में और स्वयं हममें भेद होता है क्योंकि वे परमात्मा हैं। साथ ही वे प्रत्येक वस्तु में स्थित रहते हैं किन्तु सामान्य व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वे साकार रूप में किस तरह स्थित हैं। वे भौतिक जगत से भिन्न हैं तो भी प्रत्येक वस्तु उन्हीं पर आश्रित है। यहां पर इसे ही योगम् ऐश्वरम् अर्थात भगवान की योग शक्ति कहा गया है।
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