थर्मामीटर की पकड़ से बाहर है रूह की तड़प: जब मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल आए और दिल फिर भी बेचैन रहे, तो समझें आत्म-बोध का यह गुप्त सूत्र
punjabkesari.in Tuesday, Sep 01, 2026 - 04:15 PM (IST)
Spiritual Healing: आज के दौर में इंसान के पास सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। घर है, अच्छी नौकरी है और सुखी परिवार है। लेकिन विडंबना यह है कि इन सबके बावजूद भीतर एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है। अक्सर ऐसा होता है कि हमें लगता है कि 'दिल टूट गया है' या 'मन नहीं लग रहा', पर जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो सभी रिपोर्ट सामान्य आती हैं। वास्तव में, यह पीड़ा शरीर की नहीं बल्कि उस 'आत्मा' की है, जिसे चिकित्सा विज्ञान नहीं देख सकता। यह लेख हमें बताता है कि कैसे स्वयं की पहचान और उस 'परमात्म-बीज' से जुड़कर हम जीवन की हर जलन और मानसिक थकावट से बच सकते हैं।

आधुनिक जीवन की अनेक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच जीते-जीते कई बार ऐसा होता है जब हम थक हारकर अपना हाथ हृदय के ऊपर रखकर कहने लगते हैं कि ‘पता नहीं क्यों आज दिल बड़ा परेशान है, कुछ भी अच्छा-सा नहीं लग रहा है’ और कई बार यह भी कहते हैं कि ‘मेरा दिल टूट-सा गया है, किसी भी कार्य में आज मन नहीं लग रहा है।’ यह अनुभव किसी एक का नहीं, बल्कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर दूसरे इंसान का है।
बाहर से तो सब कुछ ठीक दिखता है- नौकरी है, घर है, रिश्ते हैं, फिर भी भीतर एक अजीब-से खालीपन की अनुभूति होती रहती है। अमूमन ऐसी अवस्था में जब हम डॉक्टर के पास जाते हैं और शरीर की जांच करने के पश्चात जब कुछ भी नकारात्मक नहीं आता है, तब हम और परेशान हो जाते हैं और मन ही मन यह सोचने लगते हैं कि ‘फिर यह मुझे क्या हो रहा है? और क्यों हो रहा है?’।
डॉक्टर मुस्कुरा कर कहता है ‘सब नॉर्मल है।’ रिपोर्ट कहती है ‘कुछ गड़बड़ नहीं।’ लेकिन हम जानते हैं कि कुछ तो है जो ठीक नहीं।
यही वह क्षण है जब हमें चिकित्सा विज्ञान की सीमा दिखती है, क्योंकि वह केवल शरीर को देख सकता है, आत्मा को नहीं। ऐसी परिस्थिति में यदि हम एकांत में बैठकर खुद से थोड़ा बातें करेंगे तो हमें यह समझ आएगा कि यह दर्द कहां है, परेशानी किस को है, दिल ठीक-ठाक है तो फिर टूट कौन गया है? यदि हम शरीर हैं और डाक्टरी जांच इस ढांचे को ठीक कह रही है तो फिर अस्वस्थ कौन है? इस प्रश्न का सरल उत्तर है ‘आत्मा’।
जी हां! वास्तव में ‘आत्मा’ को जब कोई बात परेशान करती है तो उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर शरीर पर अवश्य ही दिखाई पड़ता है।
आत्मा की पीड़ा कोई काल्पनिक अवस्था नहीं है, बल्कि यह उतनी ही वास्तविक है जितना शरीर का बुखार। फर्क सिर्फ इतना ही है कि इसे थर्मामीटर से नहीं, अंतर्मन की गहराई में उतरकर महसूस किया जाता है।
जब हमारी आत्मा की चाहना के विपरीत कुछ घटता है या उसे अपनी आशा टूटने का अहसास होता रहता है, तब हमारे मुख से ये शब्द निकलते हैं कि दिल टूटा है या मन विचलित हो रहा है पर वास्तव में इन सभी के पीछे का मूल कारण है आत्मा की अतृप्त इच्छा।
अत: ऐसे वक्त पर आत्म-ज्ञान के आधार पर आत्मा का इलाज करना जरूरी है न कि शरीर का। आत्मा का इलाज कोई वैद्य या डाक्टर नहीं करता। यह इलाज केवल स्वयं की पहचान से होता है, उस गहरी पहचान से जो यह जानती है कि ‘मैं यह शरीर नहीं हूं, मैं इस शरीर में निवास करने वाली चेतना हूं।’
अपने मूल स्वरूप का ज्ञान जिसे है, ऐसा आत्मस्थ व्यक्ति कर्म करते भी, ‘इन्द्रियां कार्य कर रही हैं, व्यवहार कर रही हैं’, ऐसा समझकर उनसे न्यारा और सर्व का प्यारा बना रहता है अर्थात वह कर्मों से निर्लिप्त रहता है। जैसे महिलाएं रसोई घर में भोजन पकाते वक्त गर्म बर्तन को सीधा हाथ से नहीं पकड़तीं बल्कि कपड़े या चिमटे का प्रयोग करती हैं, इसलिए ही वे जलन से बच जाती हैं, ठीक इसी प्रकार से आत्मस्थ व्यक्ति कार्य और इंद्रियों के बीच में आत्म-स्मृति और परमात्म-स्मृति को रख लेता है जिससे कर्मों की जलन अर्थात कर्मों के लेप-छेप से वह न्यारा रहता है।
जैसे डाली का कनैक्शन बीज से हो तो बीज की सूक्ष्म शक्तियां अदृश्य रूप में डाली में भरती जाती हैं, इसी प्रकार, आत्मस्वरूप में टिके रहने से ही ईश्वर-बीज से हमारा संबंध बना रहता है और ईश्वरीय शक्तियां अदृश्य रूप में हमारी आत्मा में सन्निविष्ट होती जाती हैं। इस अद्भुत अलौकिक अनुभव के समक्ष सर्व भौतिक संपदा फीकी है और सर्व सांसारिक रंग, ऐसे रूहानी रंग के सामने बेरंग हो जाते हैं।
प्रभु की इस अनुपम अनुकम्पा का पात्र बनने के लिए अथवा यूं कहें, प्रभु प्रदत्त इस अलौकिक अनुभूति की धरोहर को पाने के लिए हमें निरंतर आत्मिक स्थिति में रहने का अभ्यास करना होगा।
जैसे ही हमारा ध्यान देह में जाए, अपने से पूछ लें, मैं कहां हूं, क्या सोच रहा हूं, क्या मैं आत्मचिंतन में हूं या शरीर चिन्तन में? यह प्रश्न छोटा लगता है, पर इसकी शक्ति असीम है। दिन में बार-बार यह प्रश्न पूछना ही ध्यान है, यही साधना है, यही आत्म योग है। याद रहे! आत्मचिंतन के अनुभवीमूर्त बनने से ही आत्मनियंत्रण, आत्म-शोधन और आत्मपरिवर्तन में हम सफलतामूर्त बन पाएंगे। इसीलिए शरीर से अपना बुद्धियोग हटाकर आत्मा की ओर ध्यान केंद्रित करें, ताकि हम तन एवं मन से सदा स्वस्थ रहें। जिस दिन हम यह जान लेंगे कि हम आत्मा हैं, उस दिन से न दिल टूटेगा, न मन भटकेगा। उस दिन से जीवन की हर परिस्थिति में एक स्थिर, शांत और प्रकाशित चेतना हमारे साथ होगी और वह चेतना और कोई नहीं, हम स्वयं होंगे।
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