वास्तु गुरु कुलदीप सलूजा: पितृ कृपा का पॉवर हाउस है ये स्थान, इस विधि से करें अपनी जड़ों से जुड़ने की आध्यात्मिक प्रक्रिया
punjabkesari.in Tuesday, Sep 01, 2026 - 09:19 AM (IST)
Place of ancestors: भारतीय संस्कृति में ‘पितृ देवो भवः’ की भावना सर्वोपरि है। पितृ हमारे कुल के आधार हैं और उनकी कृपा से ही घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। बहुत से लोग अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए घर में एक चबूतरा बनाना चाहते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, पितरों के लिए स्थान का चयन करते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए।

वास्तु शास्त्र में दिशाओं का विशेष महत्व है। पितरों का स्थान बनाने के लिए सबसे उपयुक्त दिशा दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) मानी गई है। यह दिशा पितरों का वास स्थान मानी जाती है। यहां चबूतरा बनाने से परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। यदि नैऋत्य कोण में स्थान उपलब्ध न हो, तो दक्षिण दिशा का चयन भी किया जा सकता है।

पितरों का स्थान घर के अन्य हिस्सों से अलग और पवित्र होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करें-
पितरों का चबूतरा या स्थान ऐसी जगह हो जहां साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा जा सके।
यदि आप नैऋत्य कोण में चबूतरा बना रहे हैं, तो वास्तु की दृष्टि से इसे घर के फर्श के स्तर से थोड़ा ऊंचा रखना जरूरी है।
वास्तु के अनुसार, पितरों का स्थान घर के पूजास्थल से अलग होना चाहिए। पितरों के लिए एक अलग कोना या चबूतरा बनाना ही श्रेष्ठ है।

पितरों का स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या ब्रह्मस्थान (घर का केंद्र) में न बनाएं। साथ ही, बेडरूम या किचन में इनका स्थान न बनाएं।
घर में पितरों के लिए चबूतरा या स्थान बनाना केवल एक वास्तु प्रक्रिया नहीं, बल्कि कृतज्ञता का भाव है। यह स्थान हमें अपने संस्कारों और जड़ों से जोड़े रखता है। यदि स्थान का चयन और रख-रखाव सही तरीके से किया जाए, तो पितरों का आशीर्वाद सुनिश्चित मिलता है।
वास्तु गुरु कुलदीप सलूजा
thenebula2001@gmail.com

