Pitru Paksha 2026 : क्यों जरूरी है पितरों का श्राद्ध, जानें पूर्वजों को प्रसन्न करने और तृप्त करने की खास परंपरा
punjabkesari.in Thursday, Sep 24, 2026 - 11:00 AM (IST)
Pitru Paksha 2026 : पितृ पक्ष के 16 दिनों में पितृलोक के द्वार खुल जाते हैं और हमारे पूर्वजों को हमसे मिलने की अनुमति होती है। पूर्वजों को तृप्त करने की परंपरा प्राचीन काल से ही विश्वभर में रही है। भारत में इसे पितृ पक्ष कहा जाता है; चीन, सिंगापुर और मलेशिया में 'हंग्री घोस्ट फेस्टिवल' (भूखे प्रेतों का त्योहार); इंडोनेशिया और बाली में 'हारी राया गलुंगन'; थाईलैंड में 'सत थाई'; कंबोडिया में 'पचुम बेन'; सेल्टिक देशों में 'कलन ग्वाव'; और यूरोप में 'ऑल सेंट्स डे' और 'ऑल सोल्स डे' कहा जाता है।

पितरों को तृप्त करने में गायों और बैलों को भोजन कराना, उनकी देखभाल करना और उनकी सेवा करना विशेष महत्व रखता है। हमारे शास्त्रों में वैतरणी नदी का वर्णन है, जिसे शरीर छोड़ने के बाद सभी आत्माओं को पार करना होता है। आत्मा के लिए यह एक अत्यंत कष्टदायक और भयावह अनुभव हो सकता है। कहा जाता है कि गाय या बैल की पूंछ पकड़कर इस नदी को आसानी से पार किया जा सकता है। हालांकि, मृत्यु के बाद ऐसी गाय या बैल का साथ मिलने का संयोग केवल उन्हीं को प्राप्त होता है जिन्होंने अपने जीवनकाल में गौसेवा की हो या जिनके वंशज उनकी ओर से गायों और बैलों की सेवा करें ।
यदि कोई व्यक्ति अपने पितरों की सेवा नहीं करता है, तो पूर्वजों की असंतुष्टि उसके आस-पास कई तरह की परेशानियों के रूप में सामने आती है, जैसे पारिवारिक कलह, आपसी झगड़े, आर्थिक तंगी, संतान प्राप्ति में कठिनाई या यदि संतान है, तो उससे जुड़ी परेशानियां। इसे ही 'पितृ दोष' कहा जाता है। हमारे शास्त्र हमें अपने जीवनकाल में ही पूरी कृतज्ञता या 'श्रद्धा' के साथ अपने पूर्वजों (जिन्होंने हमें यह जन्म और शरीर दिया है) का ऋण चुकाने का निर्देश देते हैं; इसीलिए इस प्रक्रिया को 'श्राद्ध' कहा जाता है। यदि आप इसमें विश्वास नहीं करते हैं, तो आपका 'ध्यान आश्रम' में स्वागत है; यहां आप पितृ यज्ञों के माध्यम से अपने पूर्वजों से संवाद कर सकते हैं और उनसे स्वयं पूछ सकते हैं!
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