Philosophy of life: सुविधाओं का अंबार और भीतर का खालीपन, क्यों अधूरी लगती है हर कामयाबी?
punjabkesari.in Thursday, Aug 13, 2026 - 10:53 AM (IST)
Philosophy of life: संसार में असंख्य लोग हैं जो आर्थिक अभावों के बावजूद प्रसन्न और संतुष्ट जीवन जीते हैं। उन्हें जीवन की आवश्यकताएं बड़ी कठिनाई से पूरी होती हैं, फिर भी वे भाग्य को कोसने या परिस्थितियों का रोना रोने में समय व्यर्थ नहीं करते। इसके विपरीत अनेक लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास धन-दौलत और सभी भौतिक सुविधाएं हैं, फिर भी वे असंतुष्ट रहते हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चे सुख का स्रोत बाहरी उपलब्धियों में खोजा, जबकि वास्तविक सुख संतोष में निहित है। भारतीय संस्कृति में संतोष को सर्वोच्च गुणों में स्थान दिया गया है। इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा गया है- ‘संतोषी नर सदा सुखी’।

संतोष का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति अपनी प्रगति के प्रयास छोड़ दे या परिस्थितियों के प्रति निष्क्रिय हो जाए। वास्तविक संतोष तो हमें सकारात्मक सोच के साथ कर्मठ बनाता है। हमारा कर्तव्य है कि हम मेहनत, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के साथ अपना श्रेष्ठ प्रयास करें तथा उसके परिणाम को सहर्ष स्वीकार करें।
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में यह धारणा बन गई है कि असंतोष ही सफलता की प्रेरणा है। निस्संदेह बेहतर बनने की स्वस्थ आकांक्षा आवश्यक है, लेकिन यदि यह लालच, ईर्ष्या या अधैर्य का रूप ले ले, तो व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो पाता। कई बार लोग अधिक लाभ पाने के लिए बेईमानी या अनैतिक रास्ता चुन लेते हैं।
इससे उन्हें कुछ समय के लिए सफलता मिल सकती है, किंतु मन की शांति और आत्मसंतोष उनसे दूर हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति बाहरी रूप से सफल दिखाई देते हैं, पर भीतर से खाली और अशांत रहते हैं।

यदि जीवन में असंतोष है तो उसका समाधान अवगुणों में नहीं, बल्कि सद्गुणों में खोजा जाना चाहिए। ईमानदारी, धैर्य, दया, क्षमा, त्याग और परोपकार जैसे गुण व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाते हैं। इसके विपरीत ईर्ष्या, क्रोध और लोभ मन को उसी प्रकार खोखला कर देते हैं, जैसे दीमक लकड़ी को।
बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर आत्मबल कमजोर हो जाता है। परिणामस्वरूप छोटी-सी विपरीत परिस्थिति भी व्यक्ति को विचलित कर देती है।
संतोषी व्यक्ति परिस्थितियों से भागता नहीं, बल्कि उनका धैर्यपूर्वक सामना करता है। वह हर अनुभव से सीखता है और अपने मन की प्रसन्नता को बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहने देता।
जिस प्रकार विशाल वृक्ष धरती से जुड़े रहने के कारण दृढ़ता से खड़ा रहता है, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी सद्गुणों की मजबूत नींव पर ही स्थिर और सुखी बनता है।
आइए, हम यह संकल्प लें कि निरंतर पुरुषार्थ करते हुए संतोष, सादगी और सद्गुणों को अपने जीवन का आधार बनाएंगे। यही वह मार्ग है, जो हमें स्थायी सुख, आत्मिक शांति और सच्ची सफलता की ओर ले जाता है।
- राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी
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Content Writer
Niyati Bhandari