No-gold weddings get popular in India: भारत में ‘नो-गोल्ड’ शादियों का बढ़ता चलन, परंपरा और भारी खर्च पर पुनर्विचार कर रहे युवा जोड़े
punjabkesari.in Wednesday, May 06, 2026 - 01:05 PM (IST)
नई दिल्ली/कोच्चि (इंट): एक तरफ जहां फिल्मी सितारे अपनी शादियों में सिर से पांव तक सोने के गहनों में लदे नजर आते हैं, वहीं भारत के शहरी और शिक्षित युवाओं के बीच एक नया और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। ‘बिग फैट इंडियन वैडिंग’ के शोर के बीच कई जोड़े अब अपनी शादी में सोने के गहनों को पूरी तरह से नकार रहे हैं या बहुत ही सीमित विकल्प चुन रहे हैं। जानकारों का कहना है कि हालांकि यह चलन अभी भी एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित है और मुख्यधारा बनने में समय लगेगा, लेकिन ‘नो-गोल्ड’ शादियां भारतीय समाज में एक स्वस्थ और कर्ज-मुक्त भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं।
सामाजिक जागरूकता और वित्तीय बोझ
केरल के कोच्चि की रहने वाली डैंटल सर्जन डा. श्रीकुट्टी सुनील कुमार के हवाले से एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि उन्होंने अपनी शादी में सोना न पहनने का कड़ा फैसला लिया। उनका मानना है कि सोने की मांग अक्सर दहेज प्रथा और वित्तीय तनाव को जन्म देती है, जो बाद में घरेलू हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों का कारण बनती है। श्रीकुट्टी ने सोने के बजाय चेन्नई से खरीदे गए मात्र 2500 रुपए के अमरीकन डायमंड सैट को चुना। इसी तरह, तिरुवल्ला की बैंकिंग प्रोफैशनल गौरी एस. नायर कहती हैं कि मेरे माता-पिता ने हमारी शिक्षा के लिए बहुत मेहनत की है। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी शादी उनके लिए कर्ज का बोझ बने। सोना तभी निवेश है जब उसे समझदारी से खरीदा जाए, न कि पर्सनल लोन लेकर।
‘स्टेटस सिंबल’ से ज्यादा ‘निजी पसंद’ को महत्व
कोझिकोड की बासिमा शाना के लिए यह फैसला दिखावे से ज्यादा खुद की सहजता का था। उन्होंने 1000 रुपए के किराए के गहने पहने और हाथ में घड़ी लगाकर अपनी सादगी से सबको प्रभावित किया। उनके पति मोहम्मद शफीक ने भी इस फैसले का पूरा समर्थन किया। दिलचस्प बात यह है कि जब सोने की कीमतें आसमान छूने लगीं, तब उन्हें अहसास हुआ कि उनका यह फैसला आर्थिक रूप से भी कितना सही था।
‘लोग क्या कहेंगे’ का डर और परिवारों का समर्थन
आई.आई.टी. मद्रास से पी.एचडी. कर रही शारिका रायरथ और उनके पति सिद्धार्थ ने जब यह फैसला लिया, तो शुरुआत में परिवार को समाज की चिंता थी, लेकिन अंततः उनके ससुराल वालों ने इसे शारिका की व्यक्तिगत पसंद मानकर स्वीकार किया। शारिका ने सोने के बजाय 28,000 रुपए के जिरकोनियम फैशन ज्वैलरी का उपयोग किया, जिसे वह आज भी दोबारा पहनती हैं। दुबई में कार्यरत आई.टी. प्रोफैशनल श्रुति रामप्रकाश ने भी अपने पिता की जीवन भर की बचत को एक दिन के आयोजन में खर्च करने से मना कर दिया। उनके चाचा मनोज कृष्णा ने फेसबुक पर एक भावुक पोस्ट लिखकर इस पहल की सराहना की और बताया कि कैसे अनावश्यक सोने की खरीद परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेल देती है।
विशेषज्ञों की राय : क्या यह सिर्फ एक फैशन है?
मनोचिकित्सक डा. चांदनी तुगनैत के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछली पीढ़ियों के लिए सोना महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा होता था, लेकिन आज की आत्मनिर्भर महिलाएं शादी को वित्तीय समझौते के रूप में नहीं देखतीं। वे दिखावे के बजाय अनुभव और अर्थपूर्ण रस्मों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। वित्तीय विशेषज्ञ हरदीप सिंह विर्दी का कहना है कि यह मानसिकता में बदलाव की शुरुआत है। युवा पीढ़ी अब सोने को गहनों के रूप में लॉकर में बंद करने के बजाय डिजिटल गोल्ड, ई.टी.एफ. या म्यूचुअल फंड में निवेश करना बेहतर समझती है।
