Mahabharata Curses Story : महाभारत के 3 सबसे खतरनाक श्रापों की पूरी कहानी, जिनका असर आज भी कलयुग पर है बरकरार
punjabkesari.in Saturday, Jul 11, 2026 - 11:34 AM (IST)
Mahabharata Curses Story : क्या आप जानते हैं कि महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं, बल्कि ऐसे श्रापों की कहानी भी है जिनके प्रभाव को आज तक याद किया जाता है। महाभारत में कई ऐसे श्राप दिए गए थे जिन्होंने न केवल उस युग की दिशा बदल दी, बल्कि कुछ मान्यताओं के अनुसार, उनका असर कलियुग तक देखने को मिलता है। कहा जाता है कि इन श्रापों ने महान योद्धाओं, राजवंशों और यहां तक कि पूरे समाज के भविष्य को प्रभावित किया। इनमें कुछ श्राप इतने भयावह थे कि उनके परिणाम पीढ़ियों तक दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे कौन-से तीन खतरनाक श्राप थे, किसने दिए थे और उनके पीछे क्या कारण था। तो आइए जानते हैं महाभारत के उन तीन रहस्यमयी और चर्चित श्रापों के बारे में, जिनका उल्लेख आज भी धार्मिक कथाओं और लोकमान्यताओं में किया जाता है।
कथाओं के अनुसार, जब महाभारत युद्ध में कर्ण की मृत्यु हुई और महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो अंतिम क्रिया के समय कुंती ने पांडवों तो सत्य बताते हुआ कहा कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था। जब यह सच ज्येष्ठ पांडू पुत्र युधिष्ठिर को पता चला तो उन्हें बहुत दुख और पछतावा होने लगा। उनके मन में ये विचार घर कर गया कि उन्होंने अपने ही भाई के खिलाफ युद्ध किया। युद्धिष्ठर को लगने लगा कि अगर उन्हें इस सत्य का पहले से पता होता तो शायद महाभारत का यह युद्ध टल सकता था। युधिष्ठिर को इस बात पर इतना क्रोध आया और उन्होंने सारी नारी जाति को श्राप दे दिया कि आज के बाद कोई भी महिला किसी भी बात को पूरी तरह छिपा नहीं सकेगी। इसी वजह से आज भी यह बात सुनने को मिलती है कि महिलाएं अपने पेट में कोई भी बात नहीं छिपाकर रख पाती है।

दूसरे श्राप के बात करें तो यह है श्राप किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं श्री कृष्ण ने गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को दिया था। इसके पीछे की कथा की बात करें तो महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार, जब युद्धभूमि में गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु हुई तो अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने अपनी सारी हदे पार कर दी थी। अश्वत्थामा रात के अंधेरे में पांडवों को मारने के लिए उनके शिविर पर धावा बोल दिया और पांडवों के सोए हुए पुत्रों की बड़ी क्रुरता से हत्या कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया था। यह कार्य युद्ध के बनाए गए नियमों के पूरी तरह खिलाफ था। इतना ही नहीं पांडवों के वंश को पूरी तरह से खत्म करने की नियत से अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। अश्वत्थामा की ऐसी क्रूरता देख श्री द्वारकाधीश श्री कृष्ण बेहद ही दुखी और क्रोधित हो उठे। लेकिन अश्वत्थामा को अपने किए पर बिल्कुल भी पछतावा नहीं था। जिसके बाद श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को बेहद ही दर्दनाक और कठोर श्राप देते हुए अश्वत्थामा पर मस्तक पर लगी मणी को बाहर निकाल दिया और कहा कि तुम कभी भी मर नहीं पाओंगे। तुम्हारे जख्म से सदैव रक्त और मवाद बेहता रहेगा, तुम हमेशा पीड़ा में रहोगे और चाहकर भी अपने प्राण नहीं त्याग पाओगे। तुम कलयुग के अंत तक इसी धरती पर भटकते रहोगे। ऐसा कहा जाता है कि आज भी अश्वत्थामा जीवित हैं। कुछ लोगों ने दावा किया है कि उन्होंने अश्वत्थामा को देखा है लेकिन इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है।
तीसरे श्राप जुड़ा है राजा परीक्षित से। राजा परीक्षित कोई और नहीं बल्कि अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र और पांडवों के पोते थे। कथाओं के अनुसार, यह कलयुग का बिल्कुल शुरुआत का समय था। कथा के अनुसार एक बार राजा परीक्षित जंगल में शिकार खेलने के लिए गए। वहां घूमते हुए उन्हें एक शमीक ऋषि दिखाई दिए जो अपनी साधना में लीन थे। राजा परीक्षित ने उनसे कई बार बातचित करने की कोशिश की लेकिन उस समय वह ऋषि मौन व्रत में थे और राजा परीक्षित की किसी भी बात का कोई उत्तर नहीं देते हैं। ऋषि के इस तरह के व्यवहार को देख राजा परीक्षित को लगा कि वह उनका अपमान कर रहे हैं और गुस्से में आकर राजा परीक्षित ने एक मरे हुए सांप को ऋषि के गले में डाल दिया। जब ऋषि के पुत्र को इस पुरी बात का पता चला तो क्रोध में आकर उसने परीक्षित को श्राप दिया कि आज से ठीक सात दिन भीतर एक सांप के काटने से तेरी मत्यु हो जाएगी। कथा कहती है कि श्राप सत्य हुआ और ठीक सात दिन तक्षक नाम के बेहद ही जहरीले नाग ने राजा परीक्षित को डस लिया और उनकी मृत्यु हो गई।
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