Lessons from Ancient Sages: प्राचीन ऋषियों की सीख, भीड़ में भी स्वयं को कैसे खोजें?

punjabkesari.in Tuesday, Jun 16, 2026 - 10:41 AM (IST)

The Real Gateway to Inner Peace: यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हम सभी इस दुनिया में अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे। दुनिया का कोई भी मनुष्य हो, चाहे वह अमीर हो या गरीब, चाहकर भी अपने साथ कुछ ले जा नहीं सकता- न पद, न प्रतिष्ठा, न संपत्ति। यहां तक कि जो शरीर जीवनभर उसे इतना प्रिय लगता है, वह भी यहीं छूट जाता है। जब हम सभी इस हकीकत से वाकिफ हैं, तो फिर इतना सब संचय करने की आवश्यकता क्या है?

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यथार्थ रीति से अपना जीवन कैसे जीना चाहिए, यह हमें प्राचीन काल के ऋषियों के जीवन से बखूबी सीखने को मिलता है, क्योंकि सभी की तरह वे भी गृहस्थ थे, किन्तु पारिवारिक जीवन में रहते हुए भी उन्होंने आत्म-तत्व की जो विशद व्याख्या की है, उसका मूलत: कारण वही था कि वे एकान्त-चिन्तन और आत्म शोधन के लिए भी पर्याप्त समय निकालते थे।

वे जानते थे कि भीड़ में रहकर भी भीड़ से अलग होना ही सच्ची साधना है। अत: हमें यह सीखना और समझना चाहिए कि जीवन के गूढ़ प्रश्नों का उत्तर जो हमें आन्तरिक शान्ति दे सकता है, उसे बाह्य वस्तुओं में या शोर-गुल के बीच खोजना निरर्थक है। उसके लिए चाहिए ‘एकांत’ जहां मनुष्य निर्विघ्न होकर प्रश्नों की गहराइयों में डूब जाए और विचारों के उमड़ते हुए समुद्र में से सत्य की सीपी ढूंढ़कर बाहर निकल आए।
 

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हममें से अधिकांश लोग यह जानते ही नहीं कि आत्मा को शरीर प्राप्त करने के बाद जो पहला संस्कार प्राप्त होता है, वह है एकान्त में वास करने का।

जी हां! सरल भाषा में कहें तो आत्मा लगभग 4 माह के गर्भस्थ अविकसित शरीर में प्रवेश करती है और लगभग 5 मास तक का एकान्तवास करती है। अर्थात् एकांत कोई बाद में सीखी हुई आदत नहीं, बल्कि यह तो मनुष्य का सबसे पहला और सबसे स्वाभाविक अनुभव है। उस दौरान यदि उसे अपने पूर्व जन्म के श्रेष्ठ कर्मों की स्मृति रहती है तो उसे गर्भ का एकान्त कष्टप्रद नहीं लगता। इसके साथ-साथ उस पर अपनी माता की मन:स्थिति का भी प्रभाव पड़ता रहता है। मसलन, यदि माता शुभ, श्रेष्ठ  संकल्पों में रहती है तो गर्भस्थ शिशु का एकान्तवास भी श्रेष्ठ बन जाता है, पर यदि माता की अवस्था इसके विपरीत रहती है तो शिशु को अंदर ही अंदर बहुत पीड़ा का अनुभव करना पड़ता है।  

विश्व भर के चिकित्सीय मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार जो माता अपनी गर्भावस्था की सम्पूर्ण अवधि के दौरान शांत व सुखमय वातावरण के बीच रहकर आध्यात्मिक साधना में अपना ज्यादा से ज्यादा समय बिताती है, वह एक स्वस्थ और तेजस्वी बालक को जन्म देती है। यह कोई केवल धार्मिक मान्यता नहीं, आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है।

याद रहे! एकान्त कोई भागना नहीं है, यह तो स्वयं की ओर लौटना है। और जो एक बार इस राह पर चल पड़ा, उसे फिर किसी बाहरी सहारे की, किसी शोर की, किसी भीड़ की तलाश नहीं रहती, क्योंकि वह खजाना वह पा चुका होता है जो सदा से उसके भीतर ही था।

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- राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी


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Content Writer

Niyati Bhandari

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