Anant Chaturdashi: ये हैं भगवान विष्‍णु के अनंत रूप, कम ही लोगों को है इसकी जानकारी

9/12/2019 8:47:31 AM

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आज भाद्रपक्ष के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। इस रोज़ गणपति विसर्जन के साथ-साथ अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जाएगा।अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्‍णु के अनंत रूपों की पूजा करने का विधान है। भगवान विष्णु सनातन परब्रह्म परमात्मा हैं। वह सनातन अव्यक्त भाव के परम आश्रय, परम गति प्रदान करने वाले तथा समस्त जीवों के एकमात्र स्वामी हैं। वह प्रकृति के तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाले हैं परन्तु स्वयं उन गुणों से रहित हैं तथा जगत का कल्याण करने के उद्देश्य से निर्गुण रहते हुए इन गुणों को स्वीकार कर सुंदर-सुंदर लीलाएं करते हैं। तीनों लोकों में ऐसा कोई चर-अचर प्राणी नहीं जो प्रकृति के इन तीन गुणा सत्व, रज तम से रहित हो लेकिन भगवान विष्णु प्रकृति को अपने अधीन करके अवतार धारण करते हैं। वह अजन्मा, अविनाशी नित्य स्वरूप, सर्वलोकाधिपति सम्पूर्ण जगत को अपनी योगमाया के अंशमात्र से धारण करके स्थित है।

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समुद्र मंथन से भगवती लक्ष्मी जी प्रकट हुईं। वह भगवान की नित्य शक्ति हैं। उन्होंने चिर अभीष्ट भगवान विष्णु जी को ही वर के रूप में चुना क्योंकि समस्त सद्गुण उनमें निवास करते हैं। प्राकृत गुण उनका स्पर्श भी नहीं कर सकते। भगवान सदा लक्ष्मी जी द्वारा सेवित रहते हैं। सीता जी तथा रुक्मिणी जी के रूप में साक्षात लक्ष्मी जी ही अपने स्वामी की सेवा हेतु इस धरा पर पधारीं। भगवान जगत की रचना के लिए रजोगुण, प्रलय के लिए तमोगुण तथा पालन के लिए सत्वगुण करते हैं इसके लिए स्वयं भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीन रूप धारण करते हैं।

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जगदीश्वर भगवान विष्णु की योगनिद्रा रूपी जो भगवती महामाया है, उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है। वह ही सम्पूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती हैं।

भगवान विष्णु सबके सुहृदय हैं। एक समय भृगु जी की पुत्री ने भगवान विष्णु की बड़ी तपस्या की। जब भगवान ने दर्शन दिए तो क्रोधित भृगु जी ने योगनिद्रा में लीन भगवान की छाती पर लात मारी तो भगवान ने मुनि के पैर पकड़ लिए और उन्हें सहलाते हुए पूछने लगे कि, ‘‘हे ब्राह्मण आपके पैर में कोई चोट तो नहीं आई?’’

भगवान का अनन्य विनम्र भाव देख कर मुनि को बड़ी ग्लानि हुई। भगवान की भक्त वत्सलता तथा शरणागत वत्सलता की अनन्त कथाओं से पुराण ओत-प्रोत है। गणिका, अजामिल जैसे अधम चरित्र वाले जीव भी भगवान की शरण को प्राप्त होकर संसार से मुक्त हो गए।

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भगवान विष्णु श्री हरि, लक्ष्मी जी के साथ शेषनाग की शैया पर क्षीर सागर में निवास करते हैं। जिसे सूर्य, चंद्रमा तथा अग्रि का प्रकाश प्रकाशित नहीं कर सकता, वह भगवान का परम धाम है। ब्रह्या, वरुण, इंद्र, रुद्र, मरुद्गण, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रमों से जिनकी स्तुति करते हैं योगी पुरुष ध्यान में स्थित होकर जिनकी उपासना करते हैं, ऐसे शांत आकृति वाले, समस्त विश्व के आधार मेघवर्ण वाले भगवान लक्ष्मीकांत, कमलनयन भगवान विष्णु भव-भय को हरने वाले हैं। भगवान विष्णु ही मोक्ष प्रदान करने वाले तथा कर्मबंधन से छुड़ाने वाले एकमात्र भगवान हैं।

दुष्टों के संहार तथा धर्म की स्थापना हेतु स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु जी श्री कृष्ण जी के रूप में देवकी तथा वासुदेव के पुत्र के रूप में कंस के कारागृह में प्रकट हुए। उन्होंने वृंदावन में सुंदर-सुंदर बाल लीलाएं कीं तथा दुष्ट राक्षसों को दंडित किया। कुरुक्षेत्र के समरांगन में अपने सखा अर्जुन को निमित्त बना कर सब ग्रंथों का सारगर्भित उपदेश श्रीमद्भागवत गीता के रूप में दिया। भगवान श्री कृष्ण की कथाओं का श्रवण समस्त कर्मबंधनों से छुड़ाने वाला, पापों का नाश करने वाला तथा समस्त पुण्यों एवं ऐश्वर्य को प्रदान करने वाला है।
भगवान विष्णु की कथाएं अनन्त हैं इसलिए उन्हें ‘अनन्त’ भी कहते हैं। जो श्री हरि जी को उनके प्रिय गोविंद, पुंडरीकाक्ष, माधव, मधुसूदन, नारायण, हरि वासुदेव, श्री कृष्ण गोपाल आदि नामों से सदैव स्मरण करता है वह सब संकटों को पार कर भगवान की पराभाक्त प्राप्त करता है।


Niyati Bhandari