दृष्टि पर कैसे र्निभर करती हैं भावनाएं

Wednesday, Mar 04, 2015 - 03:08 PM (IST)

इस संसार में दृष्टि का बहुत महत्व है। कहा भी है जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। जब जीव का अंत:करण पवित्र होता है, उसे सभी अपने स्वजन लगते हैं लेकिन मलिन हृदय वाले व्यक्ति को  स्वजन भी दुर्जन के समान लगते हैं। जब प्रभु श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण जी तथा गुरु महर्षि विश्वामित्र संग सीता जी के स्वयंवर के अवसर पर महाराज जनक के दरबार में पधारे, तब शुद्ध हृदय महात्माओं को भगवान अपने मधुराधिपति रूप में दिखे  लेकिन वहां कुछ कुटिल तथा मलिन हृदय, राजा तथा आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को भगवान साक्षात काल के रूप में दिखे और उनके हृदय में भय व्याप्त हो गया।

‘‘जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी वैसी।’’

भगवान जीव को उसकी भावना के अनुरूप ही दिखाई देते हैं। भगवद्गीता जी में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।

‘‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।’’

अर्थात जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूं। अर्जुन और दुर्योधन महाभारत के युद्ध से पूर्व एक ही समय भगवान श्री कृष्ण से सहायता लेने पहुंचे, बुद्धिहीन दुर्योधन ने भगवान के अविनाशी परमभाव को न जानते हुए, उन सच्चिदानंदधन परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण को मनुष्य की भांति जन्म कर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मान कर उनसे नारायणी सेना मांगी परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले दृढ़ निश्चयी भक्त अर्जुन ने भगवान को मांगा।

 

भगवान के इतना भर कह देने से कि मैं युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊंगा, दुर्योधन ने भगवान को महत्वहीन समझ कर उन्हें अस्वीकार कर दिया लेकिन अर्जुन ने इस सम्पूर्ण जगत के मूल कारण गोविंद भगवान के आश्रय को ग्रहण किया और भगवान की कृपा मात्र से ही युद्ध में विजय श्री प्राप्त की। स्वार्थपूर्ण दृष्टि के कारण दुर्योधन भगवान की कृपा से वंचित रह गया। 

मनुष्य के समक्ष दो विकल्प सदैव उपस्थित रहते हैं स्वार्थ अथवा परमार्थ। स्वार्थ में व्यक्तिगत लाभ तथा परमार्थ में लोकहित समाहित रहता है। स्वार्थ में लिप्त जीव अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके, दम्भ, मान और मद से युक्त किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरता है।

लेकिन सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हित में रत जीव में भय का सर्वथा अभाव, अंत:करण की पूर्ण निर्मलता, मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, सब भूत प्राणियों में हेतुरहित दया, किसी में भी शत्रुभाव का न होना इत्यादि सद्गुणों की बहुलता होती है तथा वह समस्त परमार्थ भाव से करता है। उपरोक्त दो प्रकार के आचरण से ही जीव की दृष्टि का निर्माण होता है। दुर्योधन भली-भांति जानता था कि भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य यह सभी कर्तव्यनिष्ठ हैं तथा अपने धर्म पर अडिग हैं परन्तु उसने अपनी कुटिल नीति से उन्हें अधर्म कार्य करने पर विवश किया। 

लेकिन विभीषण जैसे भक्त बहुत कम होते हैं जो अपने सगे संबंधियों का परित्याग कर केवलमात्र भगवान की ही शरण लेते हैं। सामंजस्य स्थापित करने के लिए दूसरों के विचारों को सम्मान देना अनिवार्य है। अहंकारवश अपने आपको श्रेष्ठ प्रमाणित करने की प्रवृत्ति से आसुर भाव का प्रादुर्भाव निश्चित है। रावण को बारम्बार समझाया गया कि तुम्हारे समक्ष कोई और नहीं अपितु स्वयं श्रीमन् नारायण हैं तथा जिनका तुमने हरण किया है वह स्वयं मां जगदम्बा सीता जी हैं। तब भी रावण ने अपनी भूल स्वीकार न की।

रावण का वध सारे जगत् को विदित है। रावण व दुर्योधन की समानता यही है कि उनके द्वारा दूसरों के कल्याणप्रद विचारों का सदैव तिरस्कार किया गया। भगवद्गीता जी में भगवान स्वयं कहते हैं कि जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचार कर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कर्म कहा जाता है। बुद्धिमान भक्त सदैव भगवद् आज्ञा को सर्वोपरि मानता है।

‘‘मच्चित: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरष्यिसि।

अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनड्क्ष्यसि।।’’

हे अर्जुन। मुझमें चित्त वाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अथवा परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा इसलिए तू सब प्रकार से परमपिता परमात्मा की ही शरण में जा। उनकी कृपा से ही तू परमशांति एवं परमधाम को प्राप्त होगा।    

                                                                                                                                           -रविशंकर शर्मा 

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