Sugar Price Hike : चीनी के दाम में बड़ा उछाल, कुछ जगह 80 रुपए किलो तक पहुंची कीमत; आखिर कौन कमा रहा मोटा मुनाफा?
punjabkesari.in Monday, Aug 24, 2026 - 11:05 PM (IST)
नई दिल्लीः त्योहारी सीजन के ठीक पहले देश में चीनी की आसमान छूती कीमतों ने आम जनता की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। बाजार में चीनी के दाम 50 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, जिससे उपभोक्ताओं से लेकर नीति निर्माताओं तक में भारी चिंता है। इस मूल्य वृद्धि को लेकर अब बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां किसान नेताओं ने बड़े कारोबारियों और चीनी उद्योग पर जमाखोरी और कृत्रिम कमी (आर्टिफिशियल शॉर्टेज) पैदा कर मुनाफाखोरी करने के गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार का तर्क है कि घरेलू उत्पादन में कमी, अल नीनो का असर और त्योहारी मांग में बढ़ोतरी इसके मुख्य कारण हैं ।
महज एक महीने में बढ़े दाम; ₹23,000 करोड़ के घोटाले का सनसनीखेज आरोप
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, चीनी की औसत खुदरा कीमत 20 जुलाई 2026 को 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो महज एक महीने में यानी 20 अगस्त 2026 तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। बाजार की जमीनी रिपोर्ट के अनुसार, कई खुदरा बाजारों में उपभोक्ताओं को अब 70 से 80 रुपये प्रति किलो तक का भुगतान करना पड़ रहा है ।
इस बीच, किसान नेता राजू शेट्टी ने इस बेतहाशा वृद्धि पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शेट्टी का आरोप है कि जब गन्ना किसानों को इस मूल्य वृद्धि का कोई लाभ नहीं मिला, तो कीमतें इतनी तेजी से क्यों बढ़ीं? उन्होंने दावा किया कि बड़े चीनी उत्पादक अपनी खुद की ट्रेडिंग कंपनियां भी चलाते हैं। जून तक चीनी की कीमत 3,500 से 3,600 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर थी। आरोप है कि मिलों ने इन खुद की ट्रेडिंग कंपनियों को कम दाम पर चीनी बेची और उसका भंडारण कर लिया। बाद में जब कृत्रिम कमी दिखाकर टेंडर की कीमतें लगभग 6,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचा दी गईं, तो कारोबारियों को प्रति टन लगभग 2,200 रुपये का मुनाफा हुआ। शेट्टी ने दावा किया है कि इस पूरे खेल में लगभग 22,000 से 23,000 करोड़ रुपये का भारी घोटाला हो सकता है और करीब 88 लाख मीट्रिक टन चीनी के जरिए चार महीनों में कारोबारियों को भारी फायदा पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश में नवंबर तक के लिए चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, ऐसे में तत्काल कमी का दावा पूरी तरह संदेहास्पद है।
महाराष्ट्र में किसानों का फूटा गुस्सा, सड़कों पर उतरे गन्ना उत्पादक
चीनी की कीमतों में तेजी के विरोध में महाराष्ट्र में गन्ना किसानों का गुस्सा भड़क उठा है। पुणे में साखर संकुल स्थित महाराष्ट्र चीनी आयुक्त कार्यालय के बाहर गन्ना किसानों के बच्चों ने उग्र प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी किसानों की मांग है कि चीनी की बढ़ी हुई कीमतों से होने वाले अतिरिक्त मुनाफे में गन्ना उत्पादकों को भी बड़ा हिस्सा दिया जाए। किसान वैभव मनावतकर ने कहा कि यदि बढ़ी कीमतों का फायदा सिर्फ बिचौलियों और कारोबारियों को मिल रहा है, तो सरकार को हस्तक्षेप कर किसानों को उनकी अतिरिक्त कमाई का उचित हिस्सा सुनिश्चित करना चाहिए। इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने गन्ना किसानों के बकाया बिजली बिलों को माफ करने, समय पर भुगतान करने और चीनी मिलों में गन्ने की तौल में होने वाली कथित धांधली को रोकने की मांग भी उठाई है।
सरकार और प्रशासन की दलील: खराब मौसम, अल नीनो और वैश्विक कमी है वजह
महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त संजय कोल्टे ने माना कि विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं और मौसम की बेरुखी के कारण पिछले साल की तुलना में इस साल चीनी का उत्पादन कम हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि इस साल गन्ने को इथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक मात्रा में भेजा गया। पिछले साल जहां 15 lakh मीट्रिक टन गन्ना इथेनॉल के लिए भेजा गया था, वहीं इस साल यह मात्रा बढ़कर 18 लाख मीट्रिक टन हो गई है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने इथेनॉल को कीमत वृद्धि का मुख्य कारण मानने से साफ इनकार किया है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए भेजी जाने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 के 12% से घटकर 2025-26 में लगभग 9% ही रह गया है, और देश का तीन-चौथाई इथेनॉल अब मक्का और अनाज से तैयार होता है।
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कर्नाटक के हुबली में स्पष्ट किया कि चीनी सहित कुल कृषि उत्पादन में गिरावट के पीछे 'रेड रॉट' (गन्ने की लाल सड़न बीमारी) और अल नीनो जैसे अप्रत्याशित वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं । उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर भी 2026-27 में लगभग 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतें दो महीने से भी कम समय में $474 प्रति टन (30 जून) से बढ़कर $552 प्रति टन (20 अगस्त) तक पहुंच चुकी हैं, जो 16% से अधिक की वृद्धि है।
उत्पादन अनुमान घटा, पर सरकार के पास अतिरिक्त स्टॉक सुरक्षित
शुरुआत में सरकार को गन्ना उत्पादक राज्यों से मिले आंकड़ों के आधार पर लगभग 343 लाख टन चीनी के उत्पादन की उम्मीद थी, लेकिन प्रतिकूल मौसम के बाद इस अनुमान को घटाकर अब 306 लाख टन कर दिया गया है। भारत की वार्षिक घरेलू चीनी खपत लगभग 280-290 लाख टन है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के अनुसार, "देश की जरूरत करीब 280 लाख टन है, जबकि वर्तमान में हमारे पास 20 से 25 लाख टन से अधिक का अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध है"। सरकार ने यह भी बताया कि 20 अगस्त 2026 तक वर्तमान सीजन (2025-26) के गन्ना बकाये का 97 प्रतिशत किसानों को चुकाया जा चुका है।
एक्शन में सरकार: जमाखोरी पर कसा शिकंजा, आयात और जल्द पेराई की तैयारी
कृत्रिम कमी को रोकने और त्योहारों में कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं:
- सख्त स्टॉक सीमा लागू: कारोबारियों के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक अधिकतम 400 टन चीनी रखने की सीमा तय की गई है । वहीं, 1 सितंबर से बड़े खरीदारों और थोक उपभोक्ताओं के लिए भी 15 दिनों से अधिक की जरूरत का स्टॉक रखने पर रोक रहेगी।
- सघन छापेमारी और निरीक्षण: केंद्र और राज्यों की टीमें लगातार मिलों और गोदामों का निरीक्षण कर रही हैं ताकि कोई जमाखोरी न कर सके। चीनी आयुक्त संजय कोल्टे ने चेतावनी दी है कि गोदामों में रखी चीनी को हर हाल में 7 दिनों के भीतर बाजार में लाना होगा ।
- शुल्क मुक्त आयात को मंजूरी: घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी है।
- पेराई सत्र में तेजी: राज्यों और मिलों को 15 अक्टूबर से गन्ने की पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है, जिससे उम्मीद है कि अक्टूबर में उत्पादन सामान्य से 10 लाख टन अधिक बढ़ सकता है।
