वृद्धि की रफ्तार बनाए रखने के लिए ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दें: आरबीआई एमपीसी सदस्य

punjabkesari.in Tuesday, May 05, 2026 - 02:43 PM (IST)

मुंबईः पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने ऊर्जा झटकों के प्रति भारत की संरचनात्मक कमजोरी को उजागर किया है, जिससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने एवं ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयासों में तेजी लाने की जरूरत और अधिक रेखांकित हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति के बाहरी सदस्य एवं 'इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट' के निदेशक नागेश कुमार ने कहा कि भारत के लिहाज से घरेलू स्तर पर तेल अन्वेषण बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोतों की ओर बदलाव को तेज करने पर ध्यान देना आवश्यक है। 

उन्होंने कहा, ''आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भरता भारतीय अर्थव्यवस्था को हाइड्रोकार्बन बाजार की अस्थिरता के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। हालांकि भारत की व्यापक आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। 2026-27 में लगभग सात प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ती रहेगी, लेकिन अब समय है कि तेजी से बढ़ती आर्थिक वृद्धि की राह को बनाए रखने के लिए ऊर्जा सुरक्षा एवं जुझारूपन को प्राथमिकता दी जाए।'' पश्चिम एशिया संकट ने अर्थव्यवस्था को कई माध्यमों से प्रभावित किया है, जिनमें आयात लागत में वृद्धि, रुपए पर दबाव और उद्योगों के लिए कच्चे माल की लागत में बढ़ोतरी शामिल है। प्रमुख आपूर्ति मार्गों में अवरोध ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है जिससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं और मुद्रास्फीति एवं वृद्धि परिदृश्य जटिल हुए हैं। 

कुमार ने कहा कि भारत अपनी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है जिससे वह पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। उन्होंने जोर दिया कि इस संकट को चेतावनी की तरह लेना चाहिए और दीर्घकालिक नीतिगत कार्रवाई पर गौर करना चाहिए जिसमें तेल एवं गैस के घरेलू अन्वेषण को बढ़ाना, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार करना और वैकल्पिक तथा स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बदलाव शामिल होना चाहिए। कुमार ने कहा, ''पश्चिम एशिया संकट ने आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता की गंभीरता को रेखांकित किया है जिसमें अपतटीय और स्थलीय दोनों प्रकार के अन्वेषण में अधिक निवेश, बड़े रणनीतिक भंडार का निर्माण, कारखानों एवं घरों में ईंधन की जरूरतों के लिए वैकल्पिक एवं स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर बदलाव को गति देना शामिल हैं।'' 

कीमतों में हाल में आई तेजी से चालू खाते का घाटा बढ़ने और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ने की आशंका है, हालांकि घरेलू मांग अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। इस स्थिति का असर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) जैसे क्षेत्रों पर भी पड़ा है, विशेष रूप से उन पर जो ईंधन के रूप में प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं जबकि वैश्विक वृद्धि संबंधी चिंताओं के बीच व्यापक आर्थिक धारणा भी कमजोर हुई है। इसके जवाब में सरकार ने प्रभाव को कम करने के लिए कदम उठाए हैं जिनमें आपूर्ति को स्थिर करने के लिए कूटनीतिक प्रयास और खुदरा ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे राजकोषीय उपाय शामिल हैं। 

औद्योगिक और घरेलू ऊर्जा खपत का अधिक विद्युतीकरण, साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, वैश्विक हाइड्रोकार्बन अस्थिरता के प्रभाव को कम करने के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इसके साथ ही ऊर्जा दक्षता में सुधार और आयात स्रोतों का विविधीकरण भविष्य के झटकों के खिलाफ लचीलापन बढ़ा सकता है। कुमार ने हाल के व्यापार समझौतों का लाभ उठाकर निर्यात बढ़ाने के महत्व पर भी जोर दिया, जिससे उच्च ऊर्जा आयात से उत्पन्न बाहरी असंतुलन को संतुलित करने में मदद मिल सकती है। 
 


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Content Writer

jyoti choudhary

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