गहरे समुद्र में तेल-गैस खोज का जोखिम घटाएगी सरकार, लागत का 50% तक देगी मदद
punjabkesari.in Saturday, Oct 24, 2026 - 12:03 PM (IST)
नई दिल्लीः सरकार 84,084 करोड़ रुपए की 'समुद्र मंथन' योजना के तहत गहरे समुद्र में तेल एवं गैस की खोज के जोखिम को कम करने के लिए कंपनियों को वित्तीय सहायता देगी। इसके तहत 56 खोजी कुओं की लागत का 50 प्रतिशत तक और चार भूवैज्ञानिक अध्ययन वाले कुओं की लागत का पूरा खर्च निर्धारित सीमा के भीतर सरकार उठाएगी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने योजना के संचालन संबंधी दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। इसका उद्देश्य गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज को प्रोत्साहन देना और आयातित हाइड्रोकार्बन पर भारत की निर्भरता को कम करना है।
पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने दिशानिर्देशों की प्रस्तावना में 'समुद्र मंथन' योजना को हाल के वर्षों में तेल एवं गैस की खोज और उत्पादन के क्षेत्र में 'सबसे महत्वाकांक्षी पहल' बताया। उन्होंने कहा कि इससे भारत के तेल एवं गैस भंडार में 60 करोड़ टन से अधिक तेल समतुल्य संसाधन जुड़ सकते हैं। दिशानिर्देशों के तहत, 56 खोजी कुओं के लिए सरकार अधिकतम 675 करोड़ रुपए प्रति कुआं और भूवैज्ञानिक अध्ययन वाले चार कुओं के लिए 1,350 करोड़ रुपये प्रति कुआं तक सहायता देगी। इन चार कुओं के लिए सहायता केवल सरकारी कंपनियां या उनके नेतृत्व वाले गठजोड़ हासिल कर सकेंगे।
योजना के तहत 400 मीटर से अधिक गहरे पानी वाले क्षेत्रों को गहरे समुद्र और 1,500 मीटर से अधिक गहरे पानी वाले क्षेत्रों को अति गहरे समुद्र की श्रेणी में रखा गया है। वित्तीय सहायता दो चरणों में दी जाएगी। कुएं की स्वीकृत गहराई का 40 प्रतिशत काम पूरा होने पर मंजूर राशि का 40 प्रतिशत और कुएं की खुदाई पूरी होने तथा रिपोर्ट मंजूर होने के बाद शेष 60 प्रतिशत दिया जाएगा।
सरकारी मदद की वसूली वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने के सात साल बाद या जब कंपनी खोज और विकास लागत का 50 प्रतिशत वसूल कर लेगी, इनमें से जो पहले होगा, तब शुरू होगी। हालांकि, निर्धारित सीमा से अधिक खर्च कंपनियों को स्वयं उठाना होगा। समुद्र मंथन योजना के तहत साझा उत्पादन सुविधाओं के विकास के लिए भी वित्तीय सहायता दी जाएगी। इसका उद्देश्य छोटे या ऐसे तेल-गैस भंडारों को उत्पादन व्यवस्था से जोड़ना है, जिनका अकेले दोहन आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है। इसमें समुद्र के भीतर पाइपलाइन, प्रसंस्करण मंच और साझा उत्पादन इकाइयां शामिल हैं।
साझा उत्पादन सुविधाओं के विकास के लिए शुरुआत में महानदी बेसिन पर ध्यान दिया जाएगा, जबकि कच्छ बेसिन के लिए सांकेतिक राशि का प्रावधान है। इन परियोजनाओं के प्रस्तावों को मंत्री की मंजूरी से पहले सार्वजनिक निवेश बोर्ड के समक्ष रखा जाएगा। इसके अलावा, तेल एवं गैस क्षेत्र के विनिर्माण और सेवा उद्योगों के लिए साझा सुविधाओं वाले औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की भी योजना है। दिशानिर्देशों के मुताबिक, यह योजना वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगी। वित्त वर्ष 2026-27 तैयारी का वर्ष होगा, जबकि 2027-28 से 2030-31 तक इसका पहला चरण लागू किया जाएगा।
