महिला सशक्तिकरण और दहेज

punjabkesari.in Tuesday, Apr 01, 2025 - 06:25 AM (IST)

पिछले दिनों दुर्भाग्य से एक हफ्ते के भीतर 3 निकट परिजनों की मृत्यु हुई-दो दिल्ली में और एक आगरा में। शोक से भरे माहौल में एक बात हर जगह समान दिखाई दी। अंतिम संस्कार के बाद जब सब लोग लौटते हैं तो उनके भोजन का इंतजाम उस घर की स्त्री के परिवार वालों को करना पड़ता है। यदि पति की मृत्यु हुई है तो पत्नी के मायके वाले, यदि किसी के बेटे की मृत्यु हुई है तो बहू के मायके वाले। यदि किसी स्त्री की मृत्यु हुई है तब भी भोजन का इंतजाम स्त्री के परिवार वालों को ही करना पड़ेगा।ऐसा क्यों, पूछने पर बताया गया कि जिस परिवार में ऐसी दुखद घटना हुई है वहां तो शोक है। इसलिए यह रिवाज है। यह कैसा रिवाज है? क्या उसके मायके वाले अपनी बेटी, बहन आदि के जाने से दुखी नहीं होंगे? उन पर शोक का पहाड़ नहीं टूटा होगा? मगर उनके दुखों से किसी को क्या लेना-देना। स्त्री का जाना भी कोई जाना होता है।

कई बार लगता है, हमारे यहां जो विवाह की प्रथा है, वह कुल मिलाकर स्त्री के परिवार के जीवन भर के शोषण से जुड़ी है। आखिर यूं ही तो भारत में विवाह का बाजार अरबों-खरबों का नहीं है। चलिए शुरूआत करते हैं विवाह से। देखने और लड़के-लड़की पसंद आ जाने के बाद पक्की या रोका की रस्म होती है। इसमें खूब खान-पान, पैसों, मिठाई, कपड़ों आदि का लेन-देन किया जाता है। फिर लगन, मेहंदी, हल्दी। पहले मेहंदी, हल्दी घर में ही लग जाती थीं लेकिन अब इसके लिए बाहर कोई अच्छा स्थान तलाशना पड़ता है। इन आयोजनों में भी खाने-पीने का दौर चलता है। अब आती है शादी की बात। जब से अपने यहां ब्रांड का प्रवेश हुआ है, तब से न केवल लड़के वालों को, लड़की की तरफ के रिश्तेदारों को भी भेंट में मशहूर ब्रांड्स के कपड़े उपहार आदि ही चाहिएं। शादी भी किसी महंगे होटल, बैंक्वेट हाल या फार्म हाऊस में होनी चाहिए। जितने अधिक व्यंजन, उतनी ही अच्छी शादी। फिर जेवर, कपड़े, नकदी की बात हुई हो तो वह भी। फेरे से पहले लड़के वाले किसी मांग पर अड़ गए तो वह भी पूरी करनी पड़ती है। 

दशकों पहले लड़की के लिए गहने, कपड़े ससुराल की तरफ  से आते थे लेकिन अब तो न केवल लड़की के लिए बल्कि उसके ससुराल के तमाम रिश्तेदारों के लिए गहने-कपड़े देने पड़ते हैं। कई बार बड़ी कार, हनीमून के लिए वल्र्ड टूर के टिकटों की मांग भी की जाती है। जिस पर भी लड़की को ससुराल में कुछ सुनना नहीं पड़ेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। जितनी बार लड़की विदा होकर ससुराल जाती है, दामाद जी उसे लेने आते हैं, उतनी ही बार उनकी जमकर खातिरदारी करनी पड़ती है। उपहार देने पड़ते हैं। साल भर के त्यौहारों पर मिठाई, कपड़े और लड़के वालों के यहां चलने वाले रिवाजों के अनुसार सामान भेजना पड़ता है। शादी की वर्षगांठ हो तो भी उपहारों में कमी नहीं आनी चाहिए। अब चलिए इस दम्पति के बच्चा हुआ। बहुत-सी जगह पर तो बच्चे के जन्म के लिए लड़की को उसके मायके ही भेज दिया जाता है। फिर से तरह-तरह के उपहार, गहने, कपड़े, मिठाई और भी न जाने क्या-क्या। इसे हमारी तरफ  छोछक कहते हैं। फिर बीच-बीच में ये मांगें भी कि अब घर खरीदना है तो पैसे चाहिएं। बच्चों को किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन कराना है, पति को कोई नया काम शुरू करना है, तो पैसे की जरूरत। 

विवाह को कई दशक बीत गए। अब बच्चों के विवाह का अवसर आया तो मां के घर वालों के यहां से भात आएगा।  इसमें भी सारे रिश्तेदारों के लिए कपड़े, मिठाई, गहने, फल, नकदी आदि लानी पड़ती है। मान लीजिए दो बच्चे, तो दोनों के विवाह अवसर पर। तीन-चार तो उनके भी। अब तो शादी के 25 और 50 साल मनाने का रिवाज भी चल पड़ा है। इसमें भी बहुत कुछ देना पड़ता है। यहां तक कि किसी भजन संध्या का आयोजन हो, जागरण हो तब भी बोझ स्त्री के घर वालों के सिर आता है। उम्र बीतने के साथ जीवन के अंतिम पड़ाव की तरफ  बढ़ते हैं। पति की मृत्यु हुई तो खाना आदि खिलाने की जिम्मेदारी स्त्री के परिवार की। पगड़ी रस्म आदि पर भी सब तरह की भेंट। और स्त्री की मृत्यु हुई तब भी। ये सब बातें देखकर क्या हमें जरा सा भी संकोच नहीं होता। विवाह लड़की और उसके परिवार के लिए इतनी आफत क्यों है। लाख दहेज निरोधी कानून बना लीजिए, रिवाज के नाम पर तरह-तरह से लड़की वालों को लूटना हमारे समाज की सच्चाई है। अफसोस यह है कि लड़कियां चाहे जितनी पढ़- लिख गई हैं, आत्मनिर्भर बन रही हैं, लेकिन शादी की इन परंपराओं, रिवाजों से उन्हें आसानी से छुटकारा नहीं मिलता। 

न जाने क्यों दहेज को सिर्फ  नकदी मान लिया गया है। जबकि एक लड़की के विवाह का  मतलब होता है, जीवन भर किसी न किसी रूप में दहेज देना। कई बार लोग दहेज न लेने की कसमें खाते हैं, बहुत से लोग ऐसा करते देखे भी जाते हैं मगर समाज के बहुसंख्य तबके में कोई हलचल सुनाई-दिखाई नहीं देती। आखिर शादी किसी स्त्री और उसके परिवार वालों के सिर पर पड़ी इतनी आफत क्यों है? जन्म से पहले ही लड़कियों से छुटकारा पाने के गंभीर अपराध इन्हीं कारणों से किए जाते हैं। जब तक इन तथाकथित परंपराओं और रीति-रिवाजों से मुक्त नहीं होते, स्त्री सशक्तिकरण के बारे में बातें करना बेमानी है।-क्षमा शर्मा
 


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