‘पिंक’ और ‘ब्लू’ के बीच फंसी स्त्रियां
punjabkesari.in Tuesday, Feb 17, 2026 - 04:12 AM (IST)
आम तौर पर यदि गर्भ में बच्ची हो, तो उसे बातचीत में पिंक-पिंक पुकारा जाता है। अपने देश में तो जन्म पूर्व बच्चे का लिंग जानना कानूनी अपराध है लेकिन पश्चिम में यह आम बात है। हां, वे भारतीय माता-पिता को इसे बताने से परहेज करते हैं। इसका कारण भारतीयों की विश्वभर में फैली यह बदनामी भी है कि वे यह पता चलते ही कि गर्भ में लड़की है, उससे निजात पाने की कोशिश करते हैं।
यह भी ताज्जुब होता है कि स्त्रियों को पिंक पुकारा जाए। पिंक माने गुलाबी का मतलब खुशियां और कोमलता होता है लेकिन स्त्रियों की जिंदगी की मुश्किलों को देखते हुए उन्हें इस उपाधि से विभूषित करना जैसे उनकी चुनौतियों को किसी रैपर के नीचे दबाना मालूम पड़ता है। लेकिन शायद आप जानते ही होंगे कि कम्पनियां महिलाओं के लिए जो उत्पाद बनाती हैं, उनमें से अधिकांश पिंक रैपर में होते हैं। इन्हें तरह-तरह की खुशबुओं से भरा जाता है। इन्हें आकर्षक ढंग से पैक किया जाता है। यह भी बताया जाता है कि इस तरह के उत्पादों को लांच करके महिलाओं को स्पैशल फील कराया जाता है। इन उत्पादों को महिलाओं के लिए जरूरी कह कर भी बेचा जाता है। इसे उनकी जीवन शैली और बहुत बार अच्छे स्वास्थ्य से जोड़कर भी पेश किया जाता है। जबकि वास्तविक रूप में इनका स्वास्थ्य से कोई लेना-देना नहीं होता।
कई ऐसे सर्वे करके यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि महिलाओं को यदि कोई ब्रांड या उत्पाद आकर्षित करता है, तो वे ज्यादा कीमत चुकाने के लिए भी तैयार होती हैं। यह भी कहा जाता है कि उनके लिए जो चीजें बनाई जा रही हैं, उनकी क्वालिटी अच्छी है। उनमें बेहतरीन सामान का इस्तेमाल किया गया है।
इन उत्पादों की कीमत भी अधिक होती है। इसे पिंक टैक्स कहा जाता है। यानी पुरुषों के मुकाबले महिला उत्पादों की कीमत कम्पनियां ज्यादा रखती हैं। कमाल है न कि सिर्फ महिला होने के नाते अधिक कीमत देनी पड़े। आखिर कौन सी अर्थ प्रणाली ऐसा कहती है। इसे लैंगिक समानता से भी जोड़ा जाता है, जबकि है यह असमानता। दरअसल यह कम्पनियों की मार्कीटिंग स्ट्रैटेजी है, जिससे कि वे लैंगिक समानता की बातें करके महिलाओं की जेब से अधिक से अधिक पैसे निकाल सकें। महिलाओं के लिए तमाम तरह के उत्पाद बनाने वालों की सोच यह भी है कि वे अपने लिए बनाए गए सामान पर अधिक कीमत देने के लिए तैयार होती हैं। कई बार तो लगता है कि महिलाओं को शायद इस बात का पता ही नहीं है। और यह भी कि कीमतों की यह बढ़ौतरी या टैक्स सरकार की तरफ से नहीं लगाया जाता। इसे कम्पनियां ही तय करती हैं कि महिलाओं के उत्पाद पुरुषों के लिए काम आने वाले उत्पादों से महंगे बेचने हैं।
ध्यान दें तो कम्पनियों की यह रणनीति उन महिलाओं के लिए है, जो शिक्षित हैं, आत्मनिर्भर हैं। जिनकी जेब में पैसा है, जो खरीदने का निर्णय स्वयं ले सकती हैं। ये स्त्रियां ही इन कम्पनियों की टारगेट हैं। लेकिन वे महिलाएं भी तो हैं, जो आत्मनिर्भर नहीं हैं या इतने पैसे नहीं कमातीं कि एक से एक महंगे उत्पाद खरीद सकें। इन महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा है। उत्पाद बनाने वालों को क्या इनकी जरूरत नहीं। वे इन्हें अपना उपभोक्ता क्यों नहीं बनाना चाहते। हालांकि यह भी सच्चाई है कि जिसकी जेब में ज्यादा पैसा होता है, महंगे उत्पादों तक उनकी ही पहुंच होती है। कम्पनियों का जुनून भी इन्हें ही अपनी तरफ खींचना होता है। हां बात जरूर महिला स्वतंत्रता और लैंगिक अधिकारों की की जाती है। अपने देश में भी ऐसे विज्ञापन अक्सर देखे जाते हैं, जहां किसी कार, किसी वाशिंग मशीन, किसी मोबाइल को खरीदने वाली स्त्रियों को एम्पावर्ड या शक्तिशाली दिखाया जाता है। वे ही तरह-तरह के साबुन, शैम्पू और गहने बेचती दिखाई देती हैं।
यानी कि स्त्री के सशक्तिकरण को तमाम तरह की उपभोक्ता वस्तुओं से जोड़ दिया गया है। हर अच्छे नारे को अक्सर व्यापार अपने फायदे में बदल देता है। इसीलिए अगर ध्यान से देखें तो सजी-संवरी स्त्री जो ऊपर से नीचे तक किसी न किसी उत्पाद से ढकी होती है, उसे आम मेहनतकश स्त्री के मुकाबले ज्यादा सशक्त की तरह पेश किया जाता है। वे साधनहीन स्त्रियां किसी का टारगेट नहीं होतीं, जिनकी जेब में पैसे नहीं हैं। इन दिनों चूंकि मध्यमवर्ग की स्त्रियां अधिक खरीददारी करती हैं। वे अपने को अच्छा भी दिखाना चाहती हैं तो सबकी नजर उन्हीं पर रहती है। पिंक टैक्स भी ऐसा ही है, जो इन स्त्रियों की जेब और पर्स पर पैनी नजर रखता है। अमरीका के न्यूयार्क में कंज्यूमर अफेयर्स डिपार्टमैंट ने एक सर्वे में पाया था कि महिलाओं को अपने उत्पादों पर 7 प्रतिशत अधिक कीमत देनी पड़ती है। यह टैक्स या कीमत 13 प्रतिशत अधिक भी हो सकती है। ब्रिटेन में तो कई उत्पादों की कीमत 34.28 प्रतिशत अधिक है। दूसरे देशों की तरह भारत में भी महिलाओं के लिए बनाए गए इस तरह के उत्पादों की बढ़ी कीमत पर कोई कानूनी रोक भी नहीं है। इसलिए कम्पनियां जैसी चाहे, वैसी कीमत रखती हैं। महिलाओं के साथ होने वाले इस भेदभाव पर ध्यान देने की जरूरत है।-क्षमा शर्मा
