क्या 2027 में भी आम आदमी पार्टी पर पंजाबियों को भरोसा रहेगा?
punjabkesari.in Friday, Feb 20, 2026 - 05:27 AM (IST)
2022 के विधानसभा चुनाव में पंजाबियों ने आम आदमी पार्टी (आप) के नेतृत्व पर बहुत भरोसा जताया और उसके उम्मीदवारों को रिकॉर्ड संख्या में जिताया। पंजाब के चुनावी इतिहास में यह पहली बार हुआ, जब एक ही पार्टी के 92 उम्मीदवार, वह भी ऐसी पार्टी, जिसकी लीडरशिप को किसी भी तरह से परखा नहीं गया था, जीत कर विधायक बने। इस तरह पंजाब में ‘आप’ की सरकार बनी और लोगों को उम्मीद होने लगी कि जल्द ही उनकी परेशानियां हल हो जाएंगी और ‘आप’ की गारंटी पूरी होने से उनकी जिंदगी आरामदायक हो जाएगी।क्योंकि ‘आप’ के मुखिया अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने 22 के चुनाव से पहले पंजाब के लोगों को कई गारंटियां दीं और कई वादे किए थे। ‘आप’ सरकार ने जल्द ही लोगों को 300 यूनिट फ्री बिजली देने का अपना वादा पूरा किया और दावा किया कि ‘आप’ सरकार की वजह से पंजाब के 80 प्रतिशत लोगों का बिजली बिल जीरो हो गया है।
लेकिन बाकी गारंटियां और वादे, जिसमें महिलाओं को 1000 रुपए प्रति महीना देना, बेअदबी के मामलों में 24 घंटे में इंसाफ, 3 महीने में नशा खत्म करना, वी.आई.पी. कल्चर खत्म करना, भ्रष्टाचार खत्म करके सरकारी खजाने में सालाना 34,000 करोड़ रुपए जमा करना, रेत माफिया को खत्म करके 20,00 करोड़ रुपए तथा शराब पॉलिसी के जरिए 20,000 करोड़ रुपए सरकारी खजाने में जमा करके पंजाब की आर्थिक हालत सुधार कर पंजाब को कर्ज के जाल से बाहर निकालना, सेहत और शिक्षा व्यवस्था को नंबर 1 पर लाना, कानून व्यवस्था सुधारने और पंजाब में बड़े पैमाने पर उद्योग लगाकर युवाओं के लिए रोजगार के मौके पैदा करने और विदेश जाने की जरूरत खत्म करने जैसे वादे किए गए थे।
भगवंत मान सरकार इनमें से ज्यादातर गारंटियां और वादे पूरे करने में नाकाम रही, हालांकि युवाओं को सरकारी नौकरियां देने में काफी हद तक सफल रही लेकिन विपक्ष यह भी सवाल उठाता है कि सरकार यह क्यों नहीं बताती कि इन 4 सालों में कितने कर्मचारी रिटायर हुए हैं। सरकार के ये आंकड़े जारी न करने की वजह से विपक्ष का दावा है कि रिटायरमैंट दर 5 से 9 प्रतिशत है और आरोप है कि ‘आप’ सरकार ने उतने युवाओं को नौकरी नहीं दी, जितने रिटायर हुए हैं। इन्हीं वजहों से 2 साल बाद, 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ‘आप’ को 22 के मुकाबले बहुत कम रिस्पॉन्स मिला। इन चुनावों में ‘आप’ का वोट शेयर 41 से घटकर करीब 26 प्रतिशत रह गया और पार्टी के सिर्फ 3 उम्मीदवार ही जीत पाए, जबकि ‘आप’ के 2 उम्मीदवार आजाद के तौर पर चुनाव जीतने में कामयाब रहे।
इसके अलावा, कुछ ही महीने बाद 2022 में भगवंत सिंह मान अपने ही चुनाव क्षेत्र से आजाद उम्मीदवार सिमरनजीत सिंह मान से हार गए। इन चुनावों के नतीजों से सीख लेकर ‘आप’ ने आत्ममंथन शुरू किया और पार्टी के काम करने के तरीकों में भी बदलाव किए। उसने कई तरह के कैंपेन भी चलाए। इनमें पंजाब को एक मॉडल राज्य के तौर पर पेश करना, रैवेन्यू डिपार्टमैंट पर शिकंजा कसना, बुलडोजर चलाना, महिलाओं को 1000 रुपए समेत बाकी गारंटियां और वादे पूरे करने का भरोसा दिलाना, पार्टी में अनुशासन लाना और अब ड्रग्स के खिलाफ मुहिम के अलावा और भी कई कोशिशें की जा रही हैं।
हालांकि इसी भरोसे की वजह से पार्टी को पिछले दिनों हुए उपचुनाव और स्थानीय चुनावों में कामयाबी मिली लेकिन इन जीतों को विधानसभा चुनाव जीतने की गारंटी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अगर पंजाब के पिछले राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि पंजाब के लोग भरोसा करने में तो माहिर होते हैं लेकिन जब उनके भरोसे पर थोड़ी-सी भी चोट लगती है, तो वे भरोसा छोड़ भी देते हैं, जिसके 2 हालिया उदाहरण हमारे सामने हैं।
पहला, अकाली-भाजपा सरकार का बदलना। हालांकि पंजाबियों को अकाली-भाजपा सरकार के किए गए विकास से कोई एतराज नहीं था लेकिन धार्मिक मामलों में की गई गलतियों और ड्रग्स नियंत्रण के मुद्दे पर पंजाबियों का विरोध झेलना पड़ा, जिसकी वजह से अकाली दल और भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह, कांग्रेस सरकार, जो ड्रग्स खत्म करने, किसानों का कर्ज माफ करने और विकास के वादे की वजह से सरकार बनाने में कामयाब हुई थी, उसे भी पंजाबियों ने 2022 में बाहर कर दिया। लेकिन ‘आप’ की सरकार इन तीनों पार्टियों से ज्यादा और बड़े वादे करके आगे आई थी। अब पंजाबी फिर से सोचने लगे हैं कि किस पार्टी ने पंजाबियों से किए वादे पूरे किए। इसलिए, अब ‘आप’ पर दी गई गारंटियों और वादे पूरे करने का बोझ दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। अगर पंजाबियों की सोच ऐसी ही रही और ‘आप’ गारंटियां और वादे पूरे नहीं करती, तो पंजाबियों की सोच ‘आप’ के लिए चुनौती बन सकती है और पार्टी के लिए 27 के विधानसभा चुनाव में पंजाबियों का 22 वाला भरोसा हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।-इकबाल सिंह चन्नी
