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बाढ़ से निपटने में हमारी सरकारें अब तक ‘सफल’ क्यों नहीं हो सकीं

2020-07-28T03:18:30.213

मौजूदा वक्त में बाढ़ चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी वजह है कि दो राज्य बिहार और असम बुरी तरह इसकी चपेट में आ गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो असम और बिहार में जहां तकरीबन 40 लाख लोग प्रभावित हैं, वहीं सौ से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है। असम के दो दर्जन और बिहार के एक दर्जन जिले बुरी तरह प्रभावित हैं। प्रभावित जिलों में कोरोना के बाद टायफाइड और इंसेफलाइटिस जैसी महामारियों का खतरा भी बढ़ गया है। 

एक समय था जब भारत में बाढ़ की खबरें प्रकाश में आतीं तो जहन में पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों की तस्वीरें उतर जाती थीं लेकिन हालिया वर्षों में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम लगभग सभी राज्यों से भी बाढ़ की खबरें सुनने को मिलती रही हैं। 

बाढ़ के लिए मानसून तो एक वजह है ही, लेकिन जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण के गठजोड़ ने इस आपदा को और बड़ी चुनौती के रूप में पेश किया है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि इस चुनौती से निपटने में हमारी सरकारें अब तक सफल क्यों नहीं हो सकी हैं? अगर हमारी सरकारें इस समस्या को लेकर संजीदा हैं तो अब तक हल क्यों नहीं हो सका है? क्योंकि हर साल बाढ़ जैसी आपदा हमें कई साल पीछे ले जाती है। 

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की मानें तो बाढ़ से होने वाले नुक्सान में लगभग 60 फीसदी क्षति नदियों की बाढ़ से होती है, जबकि 40 फीसदी क्षति भारी बारिश और चक्रवात के बाद आने वाली बाढ़ से। बाढ़ से होने वाले कुल नुक्सान का 27 फीसदी बिहार में, 33 फीसदी उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में और 15 फीसदी पंजाब में होता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की मानें तो आपदाओं के कारण भारत की औसत वार्षिक आर्थिक हानि 9.8 अरब डालर होने का अनुमान है, जिसमें से 7 अरब डालर से अधिक के नुक्सान का कारण अकेले बाढ़ है। 

इतना ही नहीं, बाढ़ के कारण लोग बेघर भी होते हैं और जान से हाथ भी धोते हैं। इंटरनल डिस्प्लेसमैंट मॉनीटरिंग सैंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल औसतन 20 लाख लोग बाढ़ की वजह से बेघर हो जाते हैं और चक्रवाती तूफानों के कारण औसतन 2.50 लाख लोगों को हटाया जाता है। मार्च, 2018 में संसद में बारिश और बाढ़ से जुड़े एक सवाल पर तत्कालीन केंद्रीय जल शक्ति राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बताया कि सन् 1953 से लेकर 2017 तक देश में 1,07,487 लाख लोग बाढ़ और बारिश की भेंट चढ़ गए। इस तरह से देखें तो औसतन हर साल 1,654 लोग बाढ़ जैसी आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं। 

दरअसल बाढ़ को रोकने और उसके नुक्सान को कम करने के लिए कई मोर्चों पर तैयारी की जरूरत है। सबसे पहले हमें अवसंरचनात्मक तैयारी की जरूरत है। नियोजित विकास, शहरी क्षेत्रों में हरित कवर व हरित पट्टी को बढ़ाना, भारी वर्षा के जल की निकासी व्यवस्था में सुधार करना आदि कुछ ऐसी तैयारी है जिसे अपनाकर बाढ़ के खतरे को कम किया जा सकता है। तटबंध, कटाव रोकने के उपाय, जल निकास तंत्र का सुदृढ़ीकरण, तटीय सुरक्षा के लिए दीवार जैसे उपाय किए जाने चाहिएं जो उस खास भू-आकृतिक क्षेत्र के लिए सर्वश्रेष्ठ हों।

गैर-संरचनागत उपाय के तहत आश्रय गृहों का निर्माण, सार्वजनिक उपयोग की जगहों को बाढ़ सुरक्षित बनाना, अन्तर्राज्यीय नदी बेसिन का प्रबंधन, बाढ़ के मैदानों का क्षेत्रीकरण आदि किया जा सकता है। कुछ संस्थागत तैयारियां, जैसे जनस्वास्थ्य कार्यकत्र्ताओं को प्रशिक्षित करना, वैक्सीन व दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना और बचाव के लिए मानसून पूर्व तैयारियां करना और नागरिकों के बचाव का प्रशिक्षण देना आदि करने की जरूरत है।-रिजवान अंसारी 
 


Pardeep

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