शादियों के नाम पर इतना दिखावा क्यों
punjabkesari.in Sunday, Feb 01, 2026 - 05:29 AM (IST)
हैरान हूं मैं कि शादी के आयोजन हैं या दिखावा। शादी के नाम पर पैसे का दिखावा करते हुए 8-10 समारोह, परन्तु अपने शास्त्रों द्वारा निर्धारित किए गए कोई भी रीति-रिवाज उनमें नजर नहीं आते। सिर्फ और सिर्फ हो-हल्ला और हुड़दंग ही होता है। हल्दी की रस्म में कोल्ड ड्रिंक और बीयर या वाइन के साथ होने वाले दूल्हा-दुल्हन को भिगोना, फिर वही बोतलें पकड़ कर भावी दूल्हा-दुल्हन फोटो खिंचवाते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं।
रस्मों के नाम पर ये जो रस्मों के मायने बदल गए हैं और तरीके अपने ही अदांज में हो गए हैं, किसी शरीफ और संस्कारी इन्सान के गले से तो ये चीजें नहीं उतरतीं। आज कल की पीढ़ी के लिए तो शादी के मायने ही बदल गए हैं। जिन चीजों को हमारे बुजुर्ग सोच भी नहीं सकते थे, वे सब आजकल की पीढ़ी बड़े चाव से करती है- रस्मों-रिवाजों की धज्जियां शराब और हुक्के के छल्लों में उड़ाती दिखाई दे रही है और दूल्हा-दुल्हन भी इन सब से कोई परहेज नहीं करते। शादी वाले दिन की तो बात ही न करें। जब असली रस्म (फेरों) की बारी आती है तो पंडित जी को पैसे दे कर जल्दी से खत्म करने की बात पक्की कर ली जाती है। सिर्फ और सिर्फ सजावट (तौबा-तौबा), कोई आम इन्सान तो सोच ही नहीं सकता जितना पैसा पानी की तरह इन सब पर बहाया जाता है। खाने-पीने में 50-50 तरह के स्नैक्स और मेन कोर्स में भी इतनी डिशेज कि आप खा ही नहीं सकते।
और चलिए बाद में जरा इस्तेमाल की गई प्लेटें देखें, जो खाली मिलेंगी ही नहीं। इतना खाना डाल कर फिर फैंकना, यही तो हमारी शान है और जरा सोचिए उस गरीब रिक्शा वाले या सब्जी वाले अथवा मोची या घर में रखी नौकरानी के परिवार बारे, जो हमारी बची हुई सब्जी को माथे से लगाकर अपने घर जाकर खुशी से खाते हैं। उन के लिए वही पार्टी है। जितना पैसा आजकल शादियों में लग रहा है, उससे किसी गरीब का घर बन और बस सकता है, किसी गरीब की लड़कियों की शादियों हो सकती हैं। कोई गरीब मरने से बच सकता है। हमारा समाज दिन-प्रतिदिन कहां जा रहा है, जहां न बड़ों की इज्जत है, न अपनों से प्यार। भाई-भाई का दुश्मन है। खून सफेद हो चुके हैं, किसी भी रिश्ते का कोई सम्मान तो रहा ही नहीं। शादी-ब्याह पर इतना पैसा लगाकर दिखावा करने वाले किसी गरीब की लड़की को पढ़ा-लिखा दें, उसकी शादी करवा दें। किसी गरीब के घर में राशन का महीना बांध लें तो हमारे देश की गरीबी कम होगी।
यह तो हाथ से हाथ की बात है, सोच की बात है। लिखने को तो बहुत कुछ है परन्तु अभी सिर्फ इतना ही, जो महसूस किया, जो चाहा, वही लिखा। शादियों का मौसम है, जाकर बार-बार दिखावा देख कर, प्लेटों में जूठन देख कर गरीब बच्चों या उनकी माताओं को उस जूठन में से चुग-चुग कर खाता देख कर लिखने को दिल कर आया। पता होते हुए भी कि इस छोटे से लेख में सब कुछ समा नहीं पाएगा और किसी पर भी कोई असर नहीं होगा, पर लिख दिया। किसी के मन को कोई ठेस पहुंचे तो क्षमा कीजिएगा।-सविता पब्बी
