संघर्ष की राह क्यों छोड़ दी जयंत चौधरी ने

Wednesday, Feb 21, 2024 - 05:18 AM (IST)

इस दौर के राजनीतिक माहौल को देखकर तो ऐसा लगता है कि अब राजनीति में विचारधारा का महत्व कम होता जा रहा है। अपने स्वार्थ के लिए दूसरे पाले में बैठ जाना आम हो गया है। शायद यही कारण है कि इस दौर में ज्यादातर राजनेताओं की छवि विश्वसनीय नहीं रह गई। हाल ही में आर.एल.डी. प्रमुख जयंत चौधरी उस विचारधारा के साथ खड़े हो गए, जिसका वे कई वर्षों से विरोध करते आ रहे थे। 12 फरवरी को उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया कि वे एन.डी.ए. के साथ जा रहे हैं। हालांकि उनका वह वीडियो काफी वायरल हो रहा है, जिसमें वह कह रहे हैं कि मैं कोई चवन्नी नहीं हूं, जो पलट जाऊं। एक सौदे के तहत अब वह पलट गए हैं। सवाल यह है कि क्या अब साम्प्रदायिकता उनके लिए कोई मुद्दा नहीं रहा। 

जयंत चौधरी के दादा चौधरी चरण सिंह ने अपने संघर्ष और आदर्शों से किसान राजनीति को एक नई दिशा दी थी। किसान हितों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। यही कारण है कि किसान नेता के रूप में उन्हें बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यह विडम्बना ही है कि चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह को वह सम्मान प्राप्त नहीं हो सका। अजित सिंह ताउम्र इधर-उधर लुढ़कते रहे और अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना सके। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में उन्हें अपने ही गढ़ बागपत और मुजफ्फरनगर में हार का सामना करना पड़ा। 

सवाल यह है कि इतने वर्षों तक भाजपा की सरकार रहने के बावजूद चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया? जाहिर है कि राजनीति के तहत ही उनको यह सम्मान दिया गया है। निश्चित रूप से इस सौदे में कुछ सीटें और मंत्री पद हैं। तो क्या जयंत चौधरी भी अपने ऊपर हुए लाठीचार्ज को भूलकर सौदागर हो गए हैं? जयंत चौधरी का स्वार्थ किसानों की शहादत पर भारी पड़ गया? पिछले कुछ वर्षों से जयंत जिस भाजपा को कोस रहे थे, एकदम से वह उन्हें चौधरी चरण सिंह के आदर्शों पर चलती हुई दिखाई देने लगी।  सवाल यह है कि पिछले 10 सालों में उन्हें यह झलक क्यों दिखाई नहीं दी। जयंत चौधरी ने राज्यसभा में यह भी कहा कि हम चौधरी चरण सिंह जैसी शख्सियत को किसी गठजोड़ के बनने और टूटने तथा चुनाव लडऩे और जीतने तक क्यों सीमित रखना चाहते हैं। लेकिन जयंत चौधरी ने तो भारत रत्न और नए गठजोड़ के चक्कर में चौधरी चरण सिंह को स्वयं ही सीमित कर दिया। 

दरअसल जयंत चौधरी गत कुछ वर्षों से अपनी अलग राह पर चल रहे थे। उनके क्रियाकलाप देखकर ऐसा लग रहा था कि वह चौधरी अजित सिंह से अलग छवि बनाएंगे और स्वतंत्र अस्तित्व बनाकर अपनी छाप छोड़ेंगे। दुर्भाग्य से जयंत चौधरी भी अजित सिंह की राह पर ही चल पड़े हैं। अगर वह चाहते तो लंबी लकीर खींच सकते थे लेकिन उन्होंने भाजपा की लकीर लंबी करने में दिलचस्पी दिखाई और पिछले 10 वर्षों की अपनी ही मेहनत पर पानी फेर दिया। आर.एल.डी. के विधायक और कार्यकत्र्ता भी उन पर ऐसा न करने का दबाव नहीं बना पाए। 

गौरतलब है कि अखिलेश यादव ने जयंत को राज्य सभा भेजकर अपनी दोस्ती निभाई थी। अब मुख्य रूप से मुजफ्फरनगर सीट पर पेंच फंस गया था, जबकि भाजपा भी यह सीट उन्हें नहीं दे रही। क्या एक-दो सीटों के लिए अपनी विचारधारा बदली जा सकती है? किसानों को आज तक एम.एस.पी. की कानूनी गांरटी नहीं मिली। एक बार फिर किसान अपनी समस्याओं को लेकर भाजपा के खिलाफ सड़कों पर हैं। किसान आंदोलन के दौरान लंबे समय तक भाजपा की हठधर्मिता के जयंत भी गवाह रहे हैं। क्या अब किसानों के लिए वास्तव में रामराज्य आ गया है? क्या अब किसानों की समस्याएं खत्म हो गई हैं? किसानों के लिए रामराज्य आए या न आए लेकिन जयंत चौधरी के लिए जरूर आ गया है, जिसमें किसान की झोली भरे या न भरे लेकिन जयंत की झोली अवश्य भर जाएगी। बेचारे किसानों का क्या है, वे तो संघर्ष करने के लिए ही बने हैं। 

जातिगत आधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान तो अब भी जयंत के जयकारे ही लगाएंगे। इस समय जयंत के समर्थक यह कुतर्क दे रहे हैं कि भाजपा के साथ जाने पर वे किसानों के काम करा कर उन्हें फायदा पहुंचाएंगे। इस कुतर्क के आधार पर तो 10 साल पहले ही उन्हें भाजपा के साथ चला जाना चाहिए था। बहरहाल इस सौदे से जयंत ने एक बड़े नेता बनने की संभावना खो दी है। जयंत के इस विचलन पर अफसोस ही किया जा सकता है।-रोहित कौशिक 
    

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