‘क्यों उल्टे पड़ रहे हैं सुखबीर सिंह बादल के दांव’

2021-01-14T05:18:47.977

यह डायरी लिखते हुए कई बार मन में विचार आया कि इस बार शिरोमणि अकाली दल (बादल) या उसके नेतृत्व के संबंध में कोई चर्चा नहीं की जाएगी परन्तु अचानक ही सुखबीर सिंह बादल का कोई न कोई ऐसा बयान या कृत्य सामने आ जाता है कि उसकी चर्चा किए बिना रहा नहीं जाता। 

अब देखो न, जब से सुखबीर सिंह बादल, अध्यक्ष शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने केंद्रीय सत्ताधारी एन.डी.ए. का साथ छोड़ा और पंजाब में दशकों पुराने भाजपा के साथ चले आ रहे गठजोड़ से किनारा किया, तब से ही उनका हर दांव उल्टा पड़ता चला आ रहा है जबकि ऐसा करते हुए उन्हें विश्वास था कि उनकी ओर से किसान विरोधी कृषि कानूनों के विरुद्ध ‘रोष’ प्रकट करते हुए केंद्रीय सत्ता में चली आ रही भागीदारी को ‘लात’ मार और भाजपा के साथ चले आ रहे दशकों पुराने संबंधों को तोड़ दिए जाने के किए गए ‘बलिदान’ का सम्मान करते हुए, पंजाब के किसान उन्हें सिर पर बिठा लेंगे।

परन्तु उन्होंने (किसानों ने) तो अन्य राजनीतिक पार्टियों के साथ ही उनको भी अपने आसपास फटकने नहीं दिया जिसके चलते यह माना जाने लगा कि इस स्थिति के चलते शिरोमणि अकाली दल (बादल) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को जरूर निराशा हुई होगी परन्तु पंजाब की अकाली राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है कि सुखबीर सिंह बादल उन राजनीतिक नेताओं में से नहीं, जो इतने से झटके से ही निराश हो जाएं। उन्होंने झट से दांव बदला और यह कहना शुरू कर दिया कि दिल्ली की सीमाओं पर जो किसान आंदोलन कर रहे हैं उनका संचालन बादल अकाली दल की ओर से ही किया जा रहा है। उनके इस दावे की ‘पुष्टि’ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की अध्यक्ष जगीर कौर ने भी उन्हीं के दावे को दोहरा कर दी। बात यहीं तक नहीं रही इससे भी आगे बढ़ी और सुखबीर सिंह बादल ने यह दावा भी ठोंक दिया कि किसान आंदोलन में मरने वाले 52 किसानों में से 40 उनके अकाली दल के थे। 

उनके इन दावों पर व्यंग्य करते हुए एक किसान मुखी, जो कभी सुखबीर का मार्गदर्शक रहा था, ने कहा यदि मरने वालों में 40 बादल अकाली दल के थे तो इनमें अकाली दल का कोई वरिष्ठ मुखी क्यों नहीं था? लगे हाथों उन्होंने यह भी पूछ लिया कि इन किसानों के अंतिम संस्कार और भोग (अंतिम अरदास) में बादल अकाली दल का कोई मुखी शामिल क्यों नहीं हुआ? वरिष्ठ किसान मुखी बलबीर सिंह राजेवाल तो यह तक कह गए कि लगता है कि सुखबीर सिंह बादल का दिमाग हिल गया है, जिससे वह ऐसे दावे करने लगा है। इधर दिल्ली के वरिष्ठ अकाली मुखियों परमजीत सिंह सरना और मनजीत सिंह जी.के. ने अलग-अलग बयानों में कहा कि सुखबीर सिंह बादल को दूसरों के शहीदों के खून का टीका माथे पर लगाकर अपने को ‘शहीद’ कहलवाने का शौक है। 

जी.के. की सक्रियता : ज्यों-ज्यों दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव होने का समय निकट आता चला जा रहा है, त्यों-त्यों यह चुनाव लडऩे की इच्छुक जत्थेबंदियों और उनके मुखियों द्वारा अपनी सक्रियता बढ़ाई जा रही है। इन्हीं जत्थेबंदियों में से एक है ‘जागो-जग आसरा गुरु ओट’ जिसके अध्यक्ष मनजीत सिंह जी.के. एक ओर तो अपने जन-सम्पर्क कार्यक्रम में तेजी ले आए हैं तो दूसरी ओर उन्होंने सिख मतदाताओं को लुभाने के लिए अपने पिता, ज. संतोख सिंह द्वारा किए कार्यों का सोशल मीडिया पर प्रचार भी शुरू कर दिया है। 

गुरुद्वारा चुनाव को लेकर जी.के. द्वारा अपनाई गई नीति का विश्लेषण करते हुए, दिल्ली के सिख राजनीतिज्ञों का मानना है कि मनजीत सिंह जी.के. आवश्यकता से कुछ अधिक ही आत्म-विश्वास को लेकर चल रहे हैं जोकि उनके लिए हितकर नहीं हो पाएगा। उनका मानना है कि जी.के. का यह विश्वास कि पिछले गुरुद्वारा चुनाव में उनके नेतृत्व में बादल अकाली दल ने जो रिकार्ड जीत हासिल की थी, वह उसे इस बार भी दोहराने में सफल हो जाएंगे, उनका ऐसा सोचना मात्र एक भ्रम है, उनके अनुसार इसका कारण यह है कि उस समय दिल्ली की सिख राजनीति के जो हालात थे, वह आज से बहुत भिन्न थे। 

तब चाहे शिरोमणि अकाली दल का राष्ट्रीय नेतृत्व पर्दे के पीछे चला गया था परन्तु उसका कैडर जी.के. के साथ चल रहा था, जिससे बादल दल के मतदाता भी उनके साथ आ गए थे। दूसरा, ज. संतोख सिंह के कार्यों से प्रभावित जो मतदाता उनके साथ आए थे, वे कम ही थे और उनको भी उस समय निराशा हुई, जब उन्होंने (मनजीत सिंह जी.के.ने) गुरुद्वारा चुनाव में हुई जीत को सुखबीर सिंह बादल की झोली में डाल दिया। 

सिख युवकों के भटकाव : सिख युवकों में अपनी विरासत से टूट, आ रहे भटकाव की चर्चा तो आम सुनने को मिलती रहती है परन्तु इस ओर संभवत: बहुत कम ध्यान दिया जाता है कि इसका मुख्य कारण आज के सिख युवकों का सिख इतिहास और धार्मिक मान्यताओं से अंजान होना है। उन्हें गुरु साहिबान और सिखों की उन कुर्बानियों के संबंध में कुछ भी नहीं पता जो सिखी सरूप और समूची मानवता के धार्मिक विश्वास, गरीब-मजलूम और न्याय की रक्षा के लिए दी गई। ऐसे जो युवा गुरुद्वारे जाते हैं, वे वहां हो रही अरदास में शामिल हो, ये शब्द अवश्य सुनते होंगे कि ‘जिन्हां सिंघा-सिंघनियों ने धर्म हेत सीस दिते, बंद-बंद कटाए, खोपरियां लुहाइयां, चिरखडिय़ां ते चढ़े, आरियां नाल चिराग गए, गुरुद्वारियां दी सेवा संभाल लई कुर्बानियां दितीयां, सिखी केसां-सुआसां संग निभाई, तिन्हां दी कमाई दा ध्यान धर, खालसा जी, बोलो जी वाहेगुरु, लई कुर्बानियां दितीआं, सिखी केसां-सुआसां संग निभाई, तिन्हां दी कमाई दा ध्यान धर, खालसा जी, बोलो जी वाहेगुरु, वाहेगुरु। यह शब्द सुन वे भी ‘वाहेगुरु’ बोलते होंगे। 

...और अंत में : जिस राजनीतिक स्वार्थ के लिए सिख मुखी अपनी धार्मिक जिम्मेदारी निभाने से मुंह मोड़ लेते हैं, वे उस राजनीति में भी सिख धर्म के स्वतंत्र अस्तित्व को कायम नहीं रख पाते। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि राजनीतिक लालसा के शिकार सिख मुखियों ने जिस सत्ता की प्राप्ति के लिए अपनी धार्मिक संस्थाओं और उनकी रक्षा करने के प्रति जिम्मेदारी निभाने से मुंह मोड़ा, वह भी उनकी न रह विरोधियों के हाथों में चली जाती रही। वे न तो अपने धर्म की रक्षा और न ही उसके आदर्शों के पालन करने के प्रति ईमानदार रह पाए।-न काहू से दोस्ती न काहू से बैर जसवंत सिंह ‘अजीत’


Pardeep

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