उत्तर प्रदेश में किसका कानून, किसकी व्यवस्था

10/10/2021 5:21:18 AM

शब्द बहुत स्पष्ट तथा ऊंचे हैं,  लगभग नाटकीय : ‘हम, भारत के लोग...खुद को यह संविधान सौंपते हैं।’ और हमने खुद को संविधान सौंपा ताकि सबकी सुरक्षा हो सके, जिसके अन्य उद्देश्यों में स्वतंत्रता तथा भाईचारा शामिल है। भारत के संविधान की प्रस्तावना प्रत्येक अधिकारी, मंत्री, मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री के लिए पढऩी आवश्यक बना देनी चाहिए। इनमें से प्रत्येक संविधान की शपथ लेता है। उसकी पहली बाध्यता आवश्यक तौर पर स्वतंत्रता की रक्षा करना तथा भाईचारे को बढ़ावा देना होनी चाहिए। उन्हें ऐसा करने के लिए सक्षम बनाने हेतु हमने एक संसद (भारत के लिए) तथा एक विधानसभा (प्रत्येक राज्य के लिए) बनाई हैं। हमने राज्य विधानसभाओं को ‘जनव्यवस्था’ तथा ‘पुलिस’ से संबंधित कानून बनाने तथा संसद व विधानसभा दोनों को ‘आपराधिक कानून’, आपराधिक प्रक्रियाएं तथा निवारक हिरासत जैसे विषयों पर कानून बनाने का कार्य सौंपा है। 

पालन करने के निर्देश
कानूनों को लागू करने के लिए हमने एक कार्यपालिका बनाई। हमने कार्यपालिका की शक्तियों पर नागरिकों के ‘मूलभूत अधिकारों’ के माध्यम से अंकुश लगाया तथा उन्हें चेतावनी दी कि ‘किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन तथा निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता सिवाय कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं के।’ 

हमने कार्यपालिका को उनका पालन करने का निर्देश दिया...
‘किसी भी व्यक्ति को बिना सूचित किए हिरासत में नहीं रखा जाना चाहिए, गिरफ्तारी के आधार पर जितनी जल्दी हो सके उसे सलाह करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और अपनी पसंद के किसी अधिवक्ता के माध्यम से उसे अपना बचाव करने का अधिकार होना चाहिए।’ हमने कार्यपालिका को इस बात का भी पालन करने का निर्देश दिया कि... ‘जिस व्यक्ति को भी गिरफ्तार तथा हिरासत में लिया गया है उसे 24 घंटों के भीतर किसी नजदीकी मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए...पर किसी भी व्यक्ति को इस अवधि के बाद मैजिस्ट्रेट के अधिकार के बिना हिरासत में नहीं रखा जाना चाहिए।’ 

पहले दुखद घटना,फिर कॉमेडी
लखीमपुर खीरी की दुखद घटना में 8 लोग मारे गए-4 किसानों पर एक एस.यू.वी. चढ़ा दी गई तथा 4 अन्य किसानों की मौत के बाद भड़की ङ्क्षहसा में मारे गए। यह स्वाभाविक है कि राजनीतिज्ञ गांव में जाकर पीड़ित परिवारों से मिलते हैं। उनके पास ऐसा करने का प्रत्येक अधिकार है क्योंकि हम समझते हैं कि स्वतंत्रता के यही मायने हैं। राजनीतिक भाईचारा शोकग्रस्त परिवारों के साथ सहानुभूति जता रहा है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी लखीमपुर खीरी जा रही थीं जब उन्हें सीतापुर के नजदीक रोक लिया गया।  पाबंदी से संबंधित कुछ तथ्य विवादित नहीं हैं : यह 4 अक्तूबर सोमवार को तड़के 4.30 बजे का समय था। उन्हें कहा गया कि उनको क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सी.आर.पी.सी.) की धारा 151 के अंतर्गत गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्हें पुरुष पुलिस अधिकारियों द्वारा एक पुलिस वाहन में बिठाया गया। उनको 6 अक्तूबर बुधवार की शाम तक पी.ए.सी. के गैस्ट हाऊस में हिरासत में रखा गया। 

इसके बीच के 60 घंटों में-
-श्रीमती वाड्रा को गिरफ्तारी के आधार बारे नहीं बताया गया। 
-उनको गिरफ्तारी का मैमोरैंडम नहीं दिया गया और न ही उस पर उनके हस्ताक्षर लिए गए।
-उन्हें ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। 
-यदि थी, उन्हें एफ.आई.आर. की प्रति नहीं दी गई। 
-उन्हें अपने वकील से मिलने की इजाजत नहीं दी गई जो घंटों तक गेट  पर खड़ा रहा और 
-उन्हें मंगलवार 4 अक्तूबर को बताया गया कि उन पर सी.आर.पी.सी. की धारा 151 तथा इंडियन पीनल कोड (आई.पी.सी.) की धाराओं 107 तथा 116 के अंतर्गत आरोप लगाए गए हैं। मुझे कानून की उन धाराओं की संख्या याद नहीं जिनका उल्लंघन किया गया।  यदि आपको जानने की उत्सुकता हो तो कृपया संविधान, सी.आर.पी.सी  तथा आई.पी.सी. की प्रतियां थाम लें और अनुच्छेद 19, 21 तथा 22; धाराओं 41बी, 41डी, 46, 50, 50ए, 56, 57, 60ए, 151 विशेषकर सी.आर.पी.सी. की उपधाराओं (2) तथा 167 और आई.पी.सी. की धाराओं 107 व 116 पर नजर डालें। 

अज्ञानता अथवा दंडमुक्ति 
मुझे ऐसा दिखाई देता है कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था के कंसैप्ट का एक अलग अर्थ है जिसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां एक कानून हैं जो भारतीय नहीं बल्कि योगी आदित्यनाथ का कानून है। यहां पर व्यवस्था, दरअसल कई तरह की व्यवस्थाएं हैं जो योगी आदित्यनाथ की व्यवस्थाएं हैं न कि कानूनी। पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखती है-योगी आदित्यनाथ का कानून तथा योगी आदित्यनाथ की व्यवस्था।पुलिस की समझदारी के आखिरी मोती पर नजर डालते हैं-आरोप। सी.आर.पी.सी. की धारा 151 में कोई अपराध शामिल नहीं है और इसलिए किसी को भी इस धारा के अंतर्गत ‘आरोपित’ नहीं किया जा सकता। आई.पी.सी. की धाराएं 107 तथा 116 बहकाने से संबंधित है। इस पर अलग से आरोप नहीं लगाए जा सकते। बहकाने के आरोप का अर्थ केवल तब बनता है यदि पुलिस उस व्यक्ति को नामित करे जिसे बहकाया गया अथवा बहकाने के कारण जो अपराध किया गया। ऐसा दिखाई देता है कि पुलिस में किसी ने भी इस महत्वपूर्ण खामी की ओर ध्यान नहीं दिया। इस तरह से यह आरोप ऊट-पटांग है। 

इसका केवल यही अर्थ निकाला जा सकता है कि या तो उत्तर प्रदेश की पुलिस संविधान अथवा कानूनों के बारे में नहीं जानती (अर्थात अज्ञानता) या संविधान तथा कानूनों की परवाह नहीं करती (अर्थात दंडमुक्ति)। इनमें से कोई भी विवरण उत्तर प्रदेश पुलिस पर एक काली छाया डालता है जिसमें डी.जी.पी. रैंक के  कई अधिकारी हैं। उच्च दर्जे के पुलिस अधिकारियों से लेकर कांस्टेबल तक वे बेहतर छवि के हकदार हैं। सबसे बढ़ कर उत्तर प्रदेश के 23.5 करोड़ जनसंख्या एक बेहतर पुलिस बल की हकदार है। स्वतंत्रता सुनामी द्वारा बहाकर नहीं ले जाई जाती। इसका क्षरण लहरों द्वारा होता है जो लगातार इसके किनारों से टकराती रहती है। उम्भा (सोनभद्र),  उन्नाव-1, शाहजहांपुर, उन्नाव-2, एन.आर.सी./ सी.ए.ए., हाथरस और अब लखीमपुर खीरी, क्या आप लहरें देख पा रहे हैं?-पी. चिदम्बरम


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Content Writer

Pardeep

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