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‘जो जन्मा है वह जाएगा अवश्य पर कब और कैसे’

2020-06-25T04:28:00.413

21 वर्ष की आयु इस संसार को छोड़कर जाने की आयु नहीं। पर कहते हैं कि भगवान जिन्हें प्यार करते हैं उन्हें जल्दी अपने पास बुला लेते हैं और बुलाते हैं तो एेसी शानो-शौकत के साथ जिसके लिए दुनिया तरसती है। पर यह सम्मान, सर्वोच्च बलिदान देने वालों को ही प्राप्त हो सकता है। हिमाचल प्रदेश देव भूमि भी है और वीर भूमि भी। 15 जून की रात को गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ झड़प में जिन वीरों ने शहादत पाई उनमें से शायद सबसे कम आयु के हिमाचल प्रदेश, हमीरपुर जिला के भोरंज उप-मंडल के ऊना-मंडी एक्सप्रैस हाईवे पर स्थित कड़ोहता गांव के पूर्व सैनिक श्री अनिल कुमार ठाकुर के सुपुत्र अमर शहीद अंकुश ठाकुर भी थे। 

देश की सेना में भर्ती होकर भारत की रक्षा करने के लिए अंकुश के परिवार की यह चौथी पीढ़ी है। अंकुश के पड़दादा, फिर दादा और फिर पिता श्री अनिल ठाकुर इससे पहले सेना में देश को अपनी सेवाएं दे चुके हैं। बी.एस.सी.में पढ़ रहे अंकुश अपने बुजुर्गों की तरह पंजाब रैजीमैन्ट में 2019 में भर्ती हुए। कुछ महीने पहले ही उसकी रंगरूटी की अवधि समाप्त हुई और पास होकर वह कुछ दिनों के लिए घर भी आया था। अब उसकी फिर से छुट्टी पर आने की आस लगी हुई थी पर वह तो बहुत बड़ा वीरता का कारनामा करके देश के लिए शहीद हो गया। 

अनिल ठाकुर के अनुसार वह सेवा के दौरान भी पढ़ाई जारी रखना चाहता था और वह किताबें भी साथ ले गया था। पिता के दिल में नौजवान बेटे के जाने का गम भी था और आंखों में देश के लिए बेटे की कुर्बानी के गर्व की चमक भी थी। बातचीत में हमारी हिन्दू सभ्यता की और जीवन दर्शन की झलक भी स्पष्ट थी। वह बड़े धैर्य के साथ कहते हैं कि जब दस वर्ष तक उनके बच्चा नहीं हुआ तो उन्होंने इसे बाबा से मांगा। यह बाबा का दिया हुआ बेटा था। अपने थोड़े से जीवनकाल में अंकुश देश के लिए शहीद हो गया और परिवार कुल, प्रदेश और देश का नाम ऊंचा कर गया। 

शहीद के पिता श्री अनिल ठाकुर से बात करके मैं काफी देर सोचता रहा कि हमारे देश की सबसे बड़ी शक्ति क्या है। मुझे लगा कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति है यह हमारे देश के लोगों की अपने देश के प्रति समर्पण की भावना और ईश्वर में अटूट श्रद्धा। श्री अनिल जी को इस बात का संतोष था कि चार पीढिय़ों से जो देश सेवा कर रहे थे, उनके परिवार की चौथी पीढ़ी को शहादत का सम्मान मिला, देश भर में उनका सम्मान हुआ। उनकी बातों से लगा कि उनका विश्वास है कि उन्होंने अंकुश को भगवान से मांगा था पर जितने समय के लिए उन्हें भगवान ने दिया वह उस काम को पूरा कर गया।

शहीद के पिता श्री अनिल ठाकुर ने बताया कि पंजाब रैजिमैंट के जो अधिकारी उनसे मिलने आए थे उनके व्यवहार और अंकुश के प्रति दिखाए गए उनके स्नेह और सम्मान से वह प्रभावित थे और उनका आचरण बहुत ही प्रशंसनीय था। उच्चाधिकारियों ने कहा कि अंकुश उनका भी बच्चा था। उनका एेसा कहना अंकुश के पिता के लिए बड़े गौरव और प्रशंसा की बात थी। 

1999 में कारगिल संघर्ष के दौरान भी एेसी ही भावनाएं लोगों के दिलों में थीं। कई पूर्व सैनिक जिनके बेटे शहीद हुए थे वह स्वयं सेना में जाकर सीमा पर लडऩे के लिए तैयार थे। श्री अनिल ठाकुर से मिलकर भी लगा कि हमारे लोगों का यही जज्बा और देश भक्ति की भावना हमारी स्वतंत्रता, एकता और अखंडता की सबसे बड़ी गारंटी है। शायद इसी लिए कहा गया है कि:- ‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा।’’-प्रो. प्रेम कुमार धूमल(पूर्व मुख्यमंत्री हि.प्र.)


Pardeep

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