किसी अधिकारी का पुरुष या महिला होना महत्वहीन

punjabkesari.in Friday, Apr 10, 2026 - 03:48 AM (IST)

मुंबई में रहने वालों को मुंबई नगर निगम का नेतृत्व करने के लिए एक शीर्ष स्तर के नौकरशाह को चुनने के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस का आभारी होना चाहिए। मेरे शहर के प्रत्येक निवासी के लिए दो नियुक्तियां सबसे अधिक मायने रखती हैं-नगर आयुक्त और पुलिस आयुक्त की। उनके व्यक्तित्व और मूल्य प्रणालियां हर मुंबईकर के जीवन को प्रभावित करती हैं। राज्य प्रशासन में वरिष्ठतम ‘बाबू’, मुख्य सचिव और कानून-व्यवस्था मशीनरी के प्रमुख डी.जी.पी. के कार्य मूल रूप से पर्यवेक्षी प्रकृति के होते हैं।

निवासियों को अच्छी नागरिक सुविधाएं, जलापूर्ति, गड्ढा मुक्त सड़कें और विश्वसनीय सीवेज निपटान की आवश्यकता होती है। नगर पालिका से यही मुख्य अपेक्षाएं हैं। वे अपने पुलिस बल से जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की अपेक्षा करते हैं। अपेक्षित सेवा का स्तर प्रदान करने और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए, बी.एम.सी. और मुंबई शहर पुलिस के शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को सबसे पहले निर्विवाद सत्यनिष्ठा वाला अधिकारी होना चाहिए। वे बहुत बुद्धिमान और सक्षम हो सकते हैं लेकिन यदि वे जनता की बजाय स्वयं की सेवा करने में अधिक रुचि रखते हैं, तो वे गलत दिशा में कदम बढ़ाएंगे। नगर पालिका और पुलिस, दोनों में बहुत अच्छे आयुक्त रहे हैं। राजनीतिक सत्ता में बैठे लोगों द्वारा संदिग्ध कारणों से विशेष रूप से चुने गए बहुत बुरे आयुक्त भी रहे हैं। अधिकांश नागरिक बहुत जल्दी जान जाते हैं कि कौन सार्वजनिक भलाई के लिए काम करता है और कौन खुद को समृद्ध करने के लिए। 

अश्विनी भिड़े, जिन्हें एक सप्ताह पहले ही शहर का नगर आयुक्त नियुक्त किया गया था, सत्यनिष्ठा के लिए एक जबरदस्त प्रतिष्ठा के साथ आती हैं, जो सुशासन के लिए एक ‘अनिवार्य शर्त’ है। फड़णवीस द्वारा की गई यह दूसरी लगातार हालिया नियुक्ति है, जो इस मानदंड को पूरा करती है। दूसरी नियुक्ति सदानंद दाते की राज्य के डी.जी.पी. (पुलिस महानिदेशक) के रूप में थी। मैं अश्विनी भिड़े से उनके कार्यालय में केवल एक बार मिला था और वह कुछ साल पहले की बात है। वह शहर की मैट्रो को शुरू करने और चलाने की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। उनकी प्राथमिकता परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण थी। रॉयल वैस्टर्न इंडिया टर्फ क्लब के पास इस आवश्यक भूमि का कुछ हिस्सा था। आर.डब्ल्यू.आई.टी.सी. के अध्यक्ष विवेक जैन ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं उनके साथ भिड़े से मिलने चलूं ताकि क्लब की साप्ताहिक रेसिंग आयोजित करने के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं को स्पष्ट किया जा सके। विवेक और मैं दोनों एक सीधे, व्यावहारिक और गंभीर अधिकारी की अमिट छाप लेकर उनके कार्यालय से निकले, जिन्होंने विश्वास जगाया। मुझे पता चला कि वह न केवल अटूट सत्यनिष्ठा वाली अधिकारी थीं, बल्कि एक ऐसी अधिकारी भी थीं, जो उन्हें सौंपे गए कार्य के हर विवरण को जानने पर जोर देती थीं और बिना किसी अनावश्यक शोर-शराबे या प्रचार के उसे पूरा करती थीं।

नगर आयुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति पर समाचार पत्रों की सुर्खियों ने इस तथ्य पर ध्यान केंद्रित किया कि वह बी.एम.सी. के आयुक्त के रूप में नियुक्त होने वाली पहली महिला हैं, जो 150 से अधिक वर्षों से अस्तित्व में है और संयोग से, जिसका बजट संघ के कुछ छोटे राज्यों से भी अधिक है। भिड़े ने सही बताया कि उनके लिंग का तथ्य महत्वहीन था। मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूं। जिन लोगों की सेवा की जानी है, उनके लिए धर्म, जाति, लिंग मायने नहीं रखता। अधिकारी की योग्यता ही मायने रखती है। भिड़े उन कई अन्य लोगों से बहुत ऊपर हैं, जो पहले उस पद पर रहे थे। और यदि समाचार पत्र उनके लिंग पर विस्तार से चर्चा करने के लिए इतने उत्सुक थे, तो उन्हें आई.ए.एस., आई.एफ.एस. और आई.पी.एस. की उत्कृष्ट महिलाओं की याद दिलानी होगी। जैसे विदेश सेवा अधिकारी निरुपमा राव, जो एक ऐसी सेवा से संबंधित होने के बावजूद एक घरेलू नाम हैं, जो सामान्य रूप से जनता का ध्यान आकॢषत नहीं करतीं। पंजाब कैडर की एक आई.ए.एस. अधिकारी सरला ग्रेवाल, पहली महिला कैबिनेट सचिव और बाद में प्रधानमंत्री की प्रधान सचिव थीं। महाराष्ट्र कैडर में एक शीर्ष श्रेणी की आई.पी.एस. अधिकारी मीरा चड्ढा बोरवणकर थीं। उन्हें आज भी उनके अधीन सेवा करने वाले लोग प्यार से याद करते हैं।

सबसे बड़ा पुरस्कार जिसकी एक लोक सेवक को, विशेष रूप से आई.ए.एस. या आई.पी.एस. में, आकांक्षा करनी चाहिए, वह जनता का प्यार और सम्मान है, जिसकी सेवा करने का उसे सौभाग्य मिला है। यदि पद छोडऩे के वर्षों बाद भी लोग आपका अभिवादन करते हैं और आपसे बात करने आते हैं, तो इससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता। लोग मूर्ख नहीं हैं। वे तुरंत पहचान लेते हैं कि कौन सा अधिकारी उनके लिए काम कर रहा है और वे, जो मुख्य रूप से अपनी सेवा करने के इच्छुक हैं। जब तक वे आधिकारिक पद पर रहते हैं, शायद गलत काम करके भी बच जाएंगे लेकिन सेवानिवृत्त होने के बाद, उनका उपेक्षित होना तय है।

आई.ए.एस. में प्रवेश करने के क्षण से ही, अश्विनी भिड़े को पता चल गया होगा कि आई.ए.एस. में ‘एस’ (स्) अक्षर का अर्थ ‘सेवा’ है। ‘सेवा’ शब्द उन सभी को याद दिलाना चाहिए, जो आई.ए.एस. और आई.पी.एस. में शामिल होते हैं कि वे सेवक हैं, जिन्हें लोगों की सेवा के लिए चुना गया है। कुछ लोग इसे भूल जाते हैं और फिर कुछ ऐसे भी होते हैं जो कल्पना करने लगते हैं कि वे मालिक हैं! अश्विनी भिड़े उन लोगों में से एक हैं, जिन्होंने ‘सेवा’ के अर्थ की सही व्याख्या की है। उनकी नियुक्ति में उनके लिंग का कोई लेना-देना नहीं था।-जूलियो रिबैरो
(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)    


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