आखिर कहां जाकर रुकेगी बेलगाम होती महंगाई

2021-07-21T06:22:35.253

बढ़ती महंगाई पर रोक लगाना लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल का चुनावी मुद्दा रहा है, यह बात अलग है कि विषय किसी सारगर्भित समाधान की बजाय अपनी चर्चा को लेकर अधिक चिंचित रहा। विगत वर्षों पर दृष्टिपात करें तो महंगाई दरों में लगभग प्रतिवर्ष बढ़ौतरी दर्ज की गई, किंतु महंगाई के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो वर्षों से कीमतों में आया आकस्मिक उछाल महंगाई के समस्त रिकार्ड ध्वस्त कर चुका है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना महामारी की पहली व दूसरी लहर का आना अर्थव्यवस्थाओं के चरमराने का मुख्य कारण बना। महामारी की इस उठापटक में जहां बेरोजगारी व मंदी का प्रतिशत बढ़ा, वहीं निरंतर बढ़ती महंगाई ने भी आम आदमी का जीना दूभर कर दिया। एक ओर कोरोना के दंश से संकुचित अथवा विलुप्त हुए आय के स्रोत तथा दूसरी ओर दैनिक उपभोग की वस्तुओं के निरंतर बढ़ते दाम, दो पाटों की इस चक्की ने आम आदमी को बुरी तरह पीसकर रख दिया है। 

विगत कुछ माह में न केवल खाद्य पदार्थों के भाव दोगुने-चौगुने हुए, बल्कि ईंधन के मूल्यों में भी बेतहाशा बढ़ौतरी दर्ज की गई। दूध, तेल आदि के दामों ने घरेलू बजट हिलाकर रख दिया है। अकेले ईंधन की बात करें तो मई माह में इसमें 37.5 फीसदी महंगाई दर्ज की गई। मौजूदा ‘थोक मूल्य बढ़ौतरी सूचकांक’ के अनुसार मई माह में थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई 12.94 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंची। बढ़े हुए थोक भावों का सीधा असर वस्तुओं के खुदरा दामों पर भी पड़ा। खुदरा महंगाई दर रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित लक्ष्य से 6.30 फीसदी तक अपनी बढ़त जमाकर कहीं आगे रही। जून में भी कुछ कमी आने के दावों के बीच थोक महंगाई 12.07 प्रतिशत बनी हुई है। 

चिंता का विषय है केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा इस दिशा में अब तक कोई गंभीर प्रयास नहीं किया जाना। संभवत: आवश्यक वस्तु अधिनियम की निष्क्रियता से पनपी जमाखोरी की प्रवृत्ति ने महंगाई दर में इजाफा किया, किंतु दैनिक उपभोग की वस्तुओं के बढ़ते दामों का मु य कारण पैट्रोल-डीजल के आसमान छूते भाव हैं। 

नि:संदेह कोरोना संकट का नकारात्मक प्रभाव केंद्र व राज्य स्तरीय आय स्रोतों पर भी पड़ा है। संकुचित आय स्रोतों के चलते सरकारों की ओर से उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की राहत मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे। वैसे भी केंद्र के तर्क अनुसार, पैट्रोल-डीजल के दामों में हुई अप्रत्याशित वृद्धि के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के बढ़ते भाव ही जि मेदार हैं। किंतु यदि ऐसा है तो महामारी की प्रथम लहर के दौरान जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव लगभग शून्य स्तर तक जा पहुंचे थे, तब उपभोक्ताओं को उस लाभांश का प्रतिभागी क्यों नहीं बनाया गया? प्रश्न यह भी उठता है कि लंबे समय से पैट्रोल-डीजल को जी.एस.टी. के दायरे में लाने की मांग को अब तक लंबित क्यों किया जाता रहा है? 

बढ़ते दामों पर अंकुश लगाने हेतु यदि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में वृद्धि करता है तो कदाचित यह मौद्रिक उपाय उद्योगों व निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगे, जिससे पहले से ही डगमगाई अर्थव्यस्था के पुन: पटरी से उतरने की आशंका उत्पन्न हो सकती है। चूंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के मूल्य अभी और बढऩे की आशंका व्यक्त की जा रही है, कहीं ऐसा न हो कि प्राथमिकता के आधार पर मौद्रिक नीति को उदार रखने का आश्वासन देने वाले रिजर्व बैंक को मजबूरन ब्याज दरों में बढ़ौतरी करनी पड़े और हालात बदतर हो जाएं। ऐसे में केंद्र सरकार से ही उ मीद की जा रही है कि वह महंगाई की इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए, संबद्ध विशेषज्ञों के परामर्शानुसार शीघ्रातिशीघ्र कोई समुचित समाधान निकाले, जिससे पैट्रोल-डीजल की बेकाबू होती कीमतों के साथ दैनिक उपभोग की वस्तुओं के बढ़ते मूल्यों पर लगाम लगाई जा सके। 

केंद्रीय कर्मचारियों के डी.ए. को 17 फीसदी से बढ़ाकर 28 फीसदी करने से 48 लाख कर्मचारियों तथा 65 लाख पैंशन धारकों को राहत मिलेगी, किंतु जब सवाल प्रत्येक नागरिक का आता है तो निजी व असंगठित क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति यों को संकुचित आय व बढ़ती महंगाई की कशमकश से निजात दिलाने हेतु केंद्र व राज्य सरकारें क्या कर रही हैं? सवाल तर्कसंगत है, सरकारें आत्ममंथन करें, अन्यथा, कहीं ऐसा न हो कि आम आदमी की जेब पर भारी पड़ती यह महंगाई अंतत: सरकारों पर ही भारी पड़ जाए।-दीपिका अरोड़ा
 


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Content Writer

Pardeep

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