जहां संवाद न हो-वहां विवाद ही रहता है

2021-04-06T04:24:42.297

18वीं शताब्दी के महान फ्रांसीसी विचारक तथा लेखक वोलटायर के एक कथन ‘‘मैं आपकी हर बात से सहमत नहीं हूं, परंतु अपनी बात कहने के आपके अधिकारों की रक्षा आखिरी सांस तक करूंगा’’ ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया और ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों ने इसी भावना को अपने संविधान का अहम हिस्सा बनाया। 

भारत के संविधान का निर्माण करने के समय भी सभी नेताओं ने एकमत होकर विचारों को प्रकटाने तथा बोलने की आजादी का अधिकार देश के हर नागरिक को दिया। हालांकि मेरा यह मानना है कि यह सोच यूरोप के लिए नई थी, पर भारत और विशेष करके पंजाब में इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं। इस बात की चर्चा मैं आगे करूंगा मगर पहले यह बताना जरूरी है कि आज यह बात करने की आखिर जरूरत क्यों पड़ गई? 

27 मार्च को मैं पश्चिम बंगाल के अंदर पार्टी के चुनाव प्रचार में व्यस्त था, जब मैंने मलोट में भाजपा के विधायक अरुण नारंग से हुई मारपीट की वीडियो देखी। मेरे साथ बैठे पश्चिम बंगाल के एक कार्यकत्र्ता ने वीडियो को देखते हुए कहा, ‘‘हम तो समझते थे कि केवल बंगाल में ही विरोधी विचारों को लाठी के जोर से दबाया जाता है मगर आपके यहां भी यही हाल है।’’ उनके ये शब्द सुन कर मुझे ऐसा लगा कि बेशक कपड़े एक व्यक्ति के फाड़े गए हैं मगर शर्मसार समस्त पंजाब तथा पंजाबियत हुई है। शाम होते हुए ही राष्ट्रीय चैनलों पर कई समाचार चल पड़े तो देश भर से कई दोस्तों तथा रिश्तेदारों के मुझे फोन आए। ऐसे लोग पंजाब के हालातों पर ङ्क्षचता प्रकट कर रहे थे और साथ ही साथ यह परामर्श भी दे रहे थे कि आप अपना भी बचाव रखना। 

हालांकि उनको नहीं पता कि मेरे सहित भाजपा के कई नेताओं को पिछले 6 माह में कई बार ङ्क्षहसा झेलनी पड़ी। यहां तक कि स्थानीय चुनावों में भाजपा के उम्मीदवारों को प्रचार तक भी नहीं करने दिया गया। कइयों के साथ तो मारपीट भी हुई थी। आखिर ऐसा क्यों घट रहा है? केवल इसलिए कि तीन कृषि कानूनों के बारे में भाजपा के विचार आंदोलन कर रहे किसान नेताओं के साथ नहीं मिलते। मैं आज कृषि कानूनों को लेकर बहस नहीं करना चाहता। मैं तो यह सवाल उठाना चाहता हूं कि यदि देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद द्वारा बनाए गए कानूनों पर असहमति प्रकट करने का, उसके खिलाफ आंदोलन करने का अधिकार किसान नेताओं को है तो फिर भाजपा के कार्यकत्र्ताओं को अपनी बात कहने का अधिकार क्यों नहीं? 

आज पंजाब में हम कैसा माहौल बना चुके हैं कि यदि कोई भी किसान नेता की बात से असहमति प्रकट की जाती है या फिर कृषि कानूनों के समर्थन में कोई बात करेगा तो उसका स्वागत गालियों, धमकियों या मारपीट से ही होगा। यह भेदभाव केवल भाजपा के कार्यकत्र्ताओं के साथ ही नहीं बल्कि अनेकों ऐसी निष्पक्ष गैर राजनीतिक शख्सियतों के साथ भी हो रहा है जो इस आंदोलन की भाषा, शैली तथा नीति के साथ सहमत नहीं हैं। हालात इतने खराब हो गए हैं कि जो लोग आंदोलन के साथ सहमत हैं, उसमें शामिल हैं, वे ही विचारों के अलग होने के कारण एक-दूसरे को गद्दार कहने में लगे हुए हैं। सोशल मीडिया पर मां-बहन की गालियों ने सार्थक बहस और तर्क-वितर्क करने का रास्ता बंद कर डाला है। दुख की बात यह है कि यह सब कुछ पंजाब तथा पंजाबियत के नाम पर हो रहा है। मुझे एक शे’र याद आ रहा है: 

बातचीत का दौर रखिए जनाब, बंद कमरे में तो जाले ही लगा करते हैं।
अब मैं वापस उस बात पर आऊंगा जिसके साथ यह लेख शुरू हुआ था कि दुनिया में विचारों की स्वतंत्रता और बोलने की आजादी की सोच सबसे पहले पंजाब की धरती पर ही उपजी थी। करीब 8000 वर्ष पूर्व पंजाब की धरती पर लिखे गए वेदों ने कहा कि सच कहने का प्रत्येक व्यक्ति का अपना तरीका हो सकता है इसलिए सबको सुनो, सबका सम्मान करो। आज जो कुछ घट रहा है उससे पंजाब के सामाजिक और आथक ढांचे को गहरी चोट लगी है और लगातार लग रही है। इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं कि कृषि कानूनों के मुद्दे का जल्द हल तलाशना चाहिए। मगर उसके लिए खुला हृदय और जिद को छोड़ कर बातचीत करने की भी जरूरत है। 

सरकार कई कदम आगे बढ़ी है। किसान नेताओं को भी थोड़ा आगे बढ़ना चाहिए। पंजाब के विद्वान लोगों को इस कार्य में पहल करनी होगी। नफरत और असहनशीलता का यह माहौल बदलना चाहिए ताकि पंजाब एक बार फिर से सार्थक संवाद की धरती बन सके। जहां संवाद न हो वहां विवाद ही रहता है और समाधान नहीं हो सकता।-डा. सुभाष शर्मा (महासचिव भाजपा, पंजाब) 


Content Writer

Pardeep

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