जब दाल न गले तो चीन झुकना भी जानता है

punjabkesari.in Saturday, Aug 13, 2022 - 05:24 AM (IST)

चीन के बारे में एक बात सर्वविदित है कि जहां पर वह अपना फायदा देखता है वहां पर वह झुकना भी जानता है। चीन चाहे सीमा विवाद को लेकर बातचीत में अपनी सख्ती दिखाता रहे लेकिन जहां पर चीन की दाल नहीं गलती वहां पर चीन पैंतरे बदलने से गुरेज़ नहीं करता। फिर चाहे उसे अपना दूत दुश्मन देश में ही क्यों न भेजना पड़े, वह भेजता है। 

हाल ही में चीन ने अफगानिस्तान के मुद्दे पर भारत से मदद मांगने के लिए एक विशेष दूत भारत भेजा। इस चीनी दूत का मुख्य उद्देश्य भारत से अफगानिस्तान मुद्दे पर बात करना था। दरअसल अफगानिस्तान में जबसे तालिबान काबिज हुआ है तभी से चीन को अपने उत्तर-पश्चिमी प्रांत शिनच्यांग की सुरक्षा को लेकर खतरा पैदा हो गया है। अफगानिस्तान का बदखशां प्रांत चीन के शिनच्यांग प्रांत से जुड़ा हुआ है। चीन अपने यहां रहने वाले उईगर मुसलमानों पर अत्याचार करता है यह बात सारी दुनिया जानती है। 

इसी खतरे को भांपते हुए जब चीन को पक्का यकीन हो चला था कि अब अफगानिस्तान में अब्दुल गनी की सरकार जाने वाली है और सत्ता पर तालिबान काबिज होगा तो चीन ने सबसे पहले तालिबान डैलीगेशन को बीजिंग बुलाकर अफगानिस्तान मुद्दे पर बातचीत की थी। दरअसल वह बातचीत अफगानिस्तान पर नहीं बल्कि चीन अपने शिनच्यांग प्रांत की सुरक्षा को लेकर तालिबान को अपने पाले में करना चाहता था लेकिन हुआ इसका उल्टा। 

तालिबान के लिए अपने उईगर मुस्लिम भाइयों पर चीन के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की नैतिक जिम्मेदारी महसूस होने लगी और तालिबान के कई लड़ाके इस समय बदखशां के रास्ते शिनच्यांग में घुसने की फिराक में बैठे हैं। चीन इस खतरे को बिना लड़े टालना चाहता है। चीन यह बात अच्छे तरीके से जानता है कि अफगानिस्तान में जब रूस और अमरीका जैसी दिग्गज हस्तियां नहीं टिक पाईं तो भला उसकी क्या बिसात है। इसी मुद्दे पर 06 अगस्त को चीन के दूत युए स्याओयुंग भारत आए।जहां पर उन्होंने विदेश मंत्रालय के सहसचिव जेपी सिंह से मुलाकात कर अफगानिस्तान में शांति, स्थिरता, सुरक्षा और मानवीय पहलुओं पर बात की।

चीन भारत को अफगानिस्तान मुद्दे पर कितना महत्व दे रहा है इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि इसी वर्ष मार्च में चीन के विदेशमंत्री वांग यी ने भी भारत का दौरा किया था। इस बातचीत के लिए भी चीन ने खुद भारत से आग्रह किया था। वार्ता के बाद इस बातचीत का ब्यौरा खुद युए ने दिया और बताया कि भारत के साथ अफगानिस्तान मुद्दे पर स्थिरता के लिए आपसी वार्ता को आगे बढ़ाने, सकारात्मक ऊर्जा देने पर सहमति बनी है। 

इस समय जब चीन की ताईवान को लेकर अमरीका से तल्खी अपने चरम पर है तो ऐसे में चीन की इसी में समझदारी है कि वह भारत के सामने झुक जाए जिससे उसका दक्षिणी फ्रंट सुरक्षित रहे। चीन ने पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाई और उसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में अपने फायदे के लिए करना चाहा लेकिन समय के साथ चीन को ये बात समझ में आ गई कि अफगानिस्तान में भारत की मदद के बिना एक भी कदम आगे बढ़ा पाना उसके लिए असंभव है। 

चीन यह बात अच्छी तरह से जानता है कि भारत की अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण भूमिका है और भारत ने अफग़ानिस्तान की कठिन समय में मानवीय आधार पर मदद की है। इसलिए अफगानिस्तान में भारत का प्रबल प्रभाव है। चीन को पता है कि भारत को अपने पक्ष में किए बिना अफगानिस्तान में वह अपनी किसी भी परियोजना पर काम नहीं कर सकता। भारत ने जहां अफगानिस्तान में 2 अरब डॉलर लगाए हैं तो वहीं चीन ने 15। वहां की प्राकृतिक संपदा का दोहन करने के लिए पिछली अफगान सरकार से कई तरह के समझौते किए थे लेकिन वह सारे समझौते वर्तमान तालिबान सरकार में रद्द हो चुके हैं। 

चीन अपने निवेश से अफगानिस्तान में अपना फायदा देख रहा है, चीन को वहां मुसीबत में फंसी जनता की कोई परवाह नहीं है। दरअसल, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तालिबान के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर चीनी कंपनियों द्वारा अफगानिस्तान के खनिजों के दोहन के लिए मदद मांगी थी, वहीं भारत ने भी अपनी एक तकनीकी टीम काबुल भेजकर जून महीने में दोबारा दूतावास के काम को शुरू कर दिया। 

भारत द्वारा अफगान जनता के लिए भेजी गई मानवीय सहायता के कारण अफगानिस्तान में भारत की अच्छी पैठ बनी हुई है। इसके चलते चीन को इस बात का एहसास हो चला था कि अफगानिस्तान में भारत की सहायता के बिना काम करना लगभग असंभव है। पाकिस्तान का साथ होने के बावजूद चीन यह जानता है कि बिना भारत का सहयोग लिए वह अफगानिस्तान में खुद कुछ नहीं कर सकता। समय बीतने के साथ चीन को यह समझ में आने लगा है कि अगर अफगानिस्तान में अपने निवेश से मुनाफा कमाना है तो उसे भारत के सहयोग की जरूरत पडऩे वाली है। इसलिए चीन ने अपना विशेष दूत भारत भेजा है जिससे चीन वहां पर फंसे अपने निवेश से लाभ कमा सके। 


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