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क्या है कोरोना की ‘दवा’ और ‘टीका’

2020-04-10T03:39:00.04

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई दवाइयों को लेकर दावा किया है कि ये कोरोना वायरस के इलाज में कारगर साबित हो सकती हैं। मार्च में प्रैस कांफ्रैंस के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति ने कोविड-19 के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के इस्तेमाल पर जोर दिया था। ट्रम्प ने इस दवा के बारे में बात करते हुए कहा था कि मुझे यकीन है कि यह दवाई कोरोना वायरस के इलाज में काम आएगी और हमें इसे आजमा कर देखना चाहिए। ट्रम्प के एक बयान के बाद एंटी-मलेरिया ड्रग हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन खबरों में छा गई है।

दरअसल, डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गत दिनों फोन पर कोरोना वायरस पर चर्चा की थी। इस दौरान उन्होंने कोरोना वायरस से लडऩे में मददगार मानी जाने वाली दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की सप्लाई फिर से शुरू करने को कहा, लेकिन इसके दो दिन बाद ट्रम्प ने कहा कि अगर भारत यह मदद नहीं करता तो उसका करारा जवाब दिया जाएगा। हालांकि, इस बयान के कुछ घंटों बाद भारत ने कहा कि वह बाकी देशों के साथ यह एंटी-मलेरिया ड्रग शेयर करने के लिए तैयार है। 

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल आमतौर पर मलेरिया के इलाज में किया जाता है। साथ ही इसका प्रयोग आर्थराइटिस के उपचार में भी होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस दवा का आविष्कार किया गया था। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ल्यूपस सैंटर के अनुसार, मलेरिया रोधी दवा ने मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द, स्किन रैशेज, इंफ्लेमेशन ऑफ हार्ट, लंग लाइनिंग, थकान और बुखार जैसे लक्षणों में सुधार दिखाया है और अब ऐसा माना जा रहा है कि यह दवा कोरोना वायरस के इलाज में भी काफी कारगर साबित हो सकती है। हालांकि, अभी तक किसी भी तरह का क्लीनिकल ट्रायल या परीक्षण नहीं हुआ है जिसमें यह पूरी तरह से साबित हो कि यह दवा जिसका इस्तेमाल रूमटॉइड (गठिया) में भी किया जाता है, वाकई कोरोना वायरस के इलाज में भी प्रभावी हो सकती है। 

एक छोटे से फ्रैंच शोध में कहा गया था कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना वायरस के इलाज में काम आ सकती है, जिसके बाद यू.एस. के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस दवा को कोरोना वायरस के खिलाफ  एक गेम चेंजर कहा था। कुछ  दिनों पहले भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी कोविड-19 के उपचार के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के उपयोग का सुझाव दिया था। हालांकि, इस दवा के साइड इफैक्ट भी हैं। दवा के साइड इफैक्ट्स में हार्ट ब्लॉक, हार्ट रिदम डिस्टर्बैंस, चक्कर आना, जी मिचलाना, मतली, उल्टी और दस्त हो सकते हैं। इसके अलावा इस दवा को अधिक या इसकी ओवरडोज लेने से दौरे भी पड़ सकते हैं या मरीज बेहोश हो सकता है। 

मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जा रही दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का विकास भारत और वाल्टर रीड सेवा शोध संस्थान के संयुक्त प्रयासों से हुआ है। देश में कई कम्पनियां हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की प्रॉडक्शन करती हैं। इनमें जायडस कैडिला और इप्का लैबोरेटरीज प्रमुख हैं। कम्पनियां मार्च के लिए मासिक प्रोडक्शन को 4 गुना कर 40 मीट्रिक टन तक कर सकती हैं। साथ ही अगले महीने इसकी प्रोडक्शन 5-6 गुना बढ़ाकर 70 मीट्रिक टन तक की जा सकती है। अगर ये कम्पनियां अपनी फुल कैपेसिटी पर काम करें तो हर महीने 200 एम.जी. की 35 करोड़ टैब्लेट तैयार की जा सकती हैं। भारत में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की एक टैब्लेट की कॉस्ट 3 रुपए से कम होती है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि 7 करोड़ मरीजों को ठीक करने के लिए 10 करोड़ टैब्लेट काफी हैं। ऐसे में बाकी प्रोडक्शन का निर्यात किया जा सकता है। पड़ोसी देशों के साथ-साथ अमरीका को इसका एक्सपोर्ट किया जा सकता है, जिसे उसकी जरूरत है। 

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोरोना वायरस के संक्रमण पर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन ने असर दिखाया है। यही वजह है कि बार-बार अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस दवा के लिए भारत की मदद चाहते हैं। भारत इसका बड़ा एक्सपोर्टर है। मार्च में इसके निर्यात पर बैन लगा दिया गया था। अब भारत ने इसके लिए हां कह दी है। कोरोना वायरस की मार से बेहाल अमरीका के राष्ट्रपति ने कहा कि मैंने 29 मिलियन दवा की डोज खरीदी है। इसका बड़ा हिस्सा भारत से खरीदा जाएगा। 

भारत में कोरोना वायरस का टीका तैयार करने की शुरूआत हो चुकी है। देश की बायो टैक्नोलॉजी कम्पनी भारत बायोटैक ने विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी और दवाई कम्पनी फ्लूजेन के वायरोलॉजिस्टों की मदद से कोरोना वायरस की वैक्सीन कोरोफ्लू का परीक्षण शुरू कर दिया है। कोरोफ्लू का परीक्षण अमरीका में पशुओं पर शुरू हो गया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले 3 महीने यानी जुलाई तक मनुष्य पर इसका परीक्षण शुरू हो जाएगा। यदि अमरीका में वैक्सीन का परीक्षण सफल होता है तो इसकी सुरक्षा मानकों की मंजूरी लेने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। अमरीका में सुरक्षा मानकों पर मंजूरी मिलने के बाद इस वैक्सीन को लॉन्च कर दिया जाएगा। यह देश का पहला टीका है जो कोरोना वायरस संक्रमण से बचाने का काम करेगा। वायरस से बचाने के लिए इसे नाक में डाला जाएगा। यह दावा किया जा रहा है कि दवा इतनी प्रभावी है कि सामान्य फ्लू होने पर भी इसका इस्तेमाल हो सकेगा। 

एंटी कोरोना वैक्सीन बनाने के लिए दुनिया भर की 8 वैज्ञानिकों की टीमें लगी हुई हैं। ऑस्ट्रेलिया के भी वैज्ञानिक दो संभावित कोरोना वायरस के वैक्सीन को लेकर टैस्ट शुरू कर चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और अमरीकी कम्पनी इनोविओ फार्मास्यूटिकल्स के बनाए वैक्सीन का जानवरों पर सफल परीक्षण किया जा चुका है। अगर ये वैक्सीन इंसानों पर परीक्षण में सफल पाए जाते हैं तो ऑस्ट्रेलिया की साइंस एजैंसी इसका आगे मूल्यांकन करेगी। पिछले महीने अमरीका में पहली बार इंसानों पर वैक्सीन का परीक्षण किया जा चुका है लेकिन उस वक्त जानवरों पर परीक्षण करने वाला चरण छोड़ दिया गया था। 

सी.एस.आई.आर.ओ. के डॉक्टर रॉब ग्रेनफेल का कहना है, ‘‘आमतौर पर इस स्टेज तक पहुंचने में एक से दो साल तक का वक्त लगता है लेकिन हम सिर्फ  दो महीने में यहां तक पहुंच गए हैं।’’ पिछले कुछ दिनों में सी.एस.आई.आर.ओ. की टीम ने इस वैक्सीन को गंधबिलाव (नेवले की जाति का एक जानवर) पर टैस्ट किया है। यह साबित हो चुका है कि गंधबिलाव में इंसानों की तरह ही कोरोना वायरस का संक्रमण होता है। पूरी दुनिया में कम से कम 20 वैक्सीन पर अभी काम चल रहा है। सी.एस.आई.आर.ओ. की टीम दो वैक्सीन पर काम कर रही है। 

पहला वैक्टर वैक्सीन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से विकसित किया गया है। इसमें कोरोना वायरस के प्रोटीन को इम्यून सिस्टम में डालने के लिए ‘डिफैक्टिव’ वायरस का इस्तेमाल किया जाता है और फिर इससे होने वाले प्रभावों का परीक्षण किया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जानवरों पर होने वाले परीक्षण के नतीजे जून की शुरूआत में आ सकते हैं। अगर नतीजे सही आते हैं तो वैक्सीन को क्लीनिकल परीक्षण के लिए भेजा जा सकता है। इसके बाद मार्कीट में इसके आने की प्रक्रिया तेज हो सकती है लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि कम से कम 18 महीने का वक्त इसके बाद भी दूसरी प्रक्रियाओं में लग सकता है।-निरंकार सिंह 


Pardeep

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