हमें उस भरोसे पर खरा उतरना होगा...!

punjabkesari.in Sunday, Sep 20, 2026 - 04:13 AM (IST)

मेरे पड़ोसी ने जोश में आकर कहा, ‘‘भारत को पांच अरब डॉलर मिल रहे हैं।’’ मेरे हाथ से चाय का कप लगभग गिरते-गिरते बचा। मैंने पूछा, ‘‘किससे? और सबसे जरूरी बात, हम इसे कब बांटेंगे?’’ उन्होंने रूखेपन से कहा, ‘‘यह तुम्हारे लिए नहीं है। अमरीकी कंपनी ‘एप्लाइड मैटीरियल्स’ अगले दस सालों में भारत में पांच अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही है।’’ मैंने कहा, ‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है। वह क्या बनाती है?’’ ‘‘चिप बनाने में इस्तेमाल होने वाले उपकरण।’’ ‘‘आलू के चिप्स?’’ उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे कोई बुजुर्ग रिश्तेदार को स्मार्टफोन चलाना सिखाते समय सब्र से देखता है। उन्होंने थककर कहा, ‘‘कम्प्यूटर चिप्स। वे छोटी-छोटी चीजें, जो फोन, कार, मैडिकल उपकरणों, सैटेलाइट और लगभग हर आधुनिक मशीन को चलाती हैं।’’

मैंने सोच-समझकर अपने फोन की ओर देखा। उस सुबह वह दो बार गिर चुका था, मेरा चेहरा पहचानने से इंकार कर रहा था और मेरे पुजारी को भेजे गए मैसेज में ‘गुड मार्निंग’ को ‘गोट मॉर्निंग’ (बकरी का शोक) में बदल दिया था। मैंने कहा, ‘‘लगता है उसके अंदर की वह छोटी सी चीज बहुत ज़्यादा काम कर रही है।’’ फिर भी, यह सच में उत्साह बढ़ाने वाली खबर है। सालों से भारत अपने सबसे अच्छे दिमागों को विदेश भेजता रहा है। अब दुनिया को सिर्फ दिमाग सप्लाई करने से कहीं ज्यादा करने का मौका है। हम ऐसी प्रयोगशालाएं, फैक्टरियां और हुनर विकसित कर सकते हैं, जो उन दिमागों को यहीं कुछ नया बनाने में मदद करें।

सैमीकंडक्टर चिप्स भले ही छोटी हों लेकिन उनसे जुड़ी इंडस्ट्री बहुत बड़ी है। जो देश ऐसी टैक्नोलॉजी बना सकता है और उसे सपोर्ट कर सकता है, उसे न सिर्फ पैसा और रोजगार, बल्कि आत्मविश्वास भी मिलता है। वह दूसरों की बनाई चीजें खरीदने की बजाय ऐसी चीजें बनाने की ओर बढऩे लगता है, जिन्हें दूसरे खरीदना चाहते हैं। मेरे पड़ोसी ने समझदारी से सिर हिलाया। उन्होंने कहा, ‘‘इससे भारत एक बड़ा टैक्नोलॉजी सैंटर बन सकता है।’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘बशर्ते फैक्टरी बनाने के लिए एप्लीकेशन फॉर्म में सत्रह फोटोकॉपी, तीन हलफनामे और 1996 में रिटायर हुए किसी अफसर के साइन की जरूरत न हो।’’ उन्होंने सिर हिलाना बंद कर दिया।

सिर्फ निवेश काफी नहीं होगा। मैंने मन ही मन सोचा और साथ ही जश्न के तौर पर उन्होंने जो चाय का कप मुझे दिया, उसे खुशी-खुशी ले लिया। हमें टैलेंट के लिए काम करना, रिसर्च को आगे बढ़ाना और आइडिया को प्रोडक्ट में बदलना आसान बनाना होगा। हमें अपने युवाओं को सिर्फ टैक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना ही नहीं, बल्कि उसे समझना और बनाना भी सिखाना होगा। सबसे जरूरी बात, हमें वफादारी की बजाय काबिलियत, लकीर का फकीर बनने की बजाय जिज्ञासा और आज्ञाकारी होने के बजाय इनोवेशन को बढ़ावा देना होगा। एप्लाइड मैटेरियल्स भारत पर पांच अरब डॉलर का भरोसा जता रहा है। हमें कुशलता, शिक्षा और ईमानदारी के साथ उस भरोसे पर खरा उतरना होगा।

बहुत समय से हम यह शिकायत करते रहे हैं कि दुनिया हमारी महानता को नहीं पहचानती। अब शायद हम उस सोच को छोड़कर, उसे एक मशीन में लगा सकते हैं और भारतीय टैलेंट को दुनिया को यह दिखाने का मौका दे सकते हैं कि वह क्या कर सकता है...!-दूर की कौड़ी राबर्ट क्लीमैंट्स     
 


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